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पटना: बिहार के मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद जेडीयू अब महिलाओं, महादलितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों (MBC) के बीच अपने जनाधार को बरकरार रखने की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है। पिछले दो दशकों में नीतीश ने अपनी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की मजबूती के बजाए अपनी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के माध्यम से पार्टी के समर्थन को मजबूत किया। उनके जाने के साथ जेडीयू अब अपनी जमीनी उपस्थिति को मौजूद करने में जुटी है। अपने मूल समर्थन आधार को बनाए रखने के लिए नई रणनीतियों को खोजने के लिए मजबूर हो सकती है।
नीतीश कुमार ने 'जीविका' कार्यक्रम के तहत स्वयं सहायता समूहों का एक व्यापक नेटवर्क विकसित किया। जिसमें लगभग 1 करोड़ 40 लाख महिलाएं शामिल हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में उन्होंने आशा और ममता कार्यकर्ताओं की नियुक्ति के माध्यम से महिला मतदाताओं का एक बड़ा आधार तैयार किया।
बिहार में कुछ दिनों पहले तक सीएम रहे नीतीश के अब सत्ता के शीर्ष पर नहीं हैं। ऐसे में देखना बाकी है कि क्या कल्याणकारी योजनाओं के ये लाभार्थी उनकी पार्टी के लिए एक वफादार समर्थन आधार के रूप में बने रहेंगे? ये स्पष्ट रूप से जेडीयू के भीतर बढ़ती चिंता को रेखांकित करता है कि कैसे इन राज्य-संबद्ध कार्यकर्ताओं को जल्द से जल्द सीधे पार्टी संगठन से जोड़ा जाए।
पार्टी के एक सूत्र ने कहा, 'यह अब करो या मरो की स्थिति है। नितीश कुमार जी अब सरकार का चेहरा नहीं हैं। राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखने को लेकर जेडीयू के पास चिंतित होने के पर्याप्त कारण हैं।'
इन नई परिस्थितियों में सभी की निगाहें नीतीश के बेटे निशांत कुमार पर टिकी हैं, जो हाल ही में जेडीयू में शामिल हुए हैं और कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने के लिए अक्सर पार्टी कार्यालय जाने लगे हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से बाहर रहने का उनका निर्णय चाहे उपमुख्यमंत्री के रूप में हो या मंत्री के रूप में पार्टी नेताओं और नीतीश के मूल मतदाता आधार के बीच उनकी स्वीकार्यता बनाने की जेडीयू की व्यापक रणनीति का हिस्सा लगता है।
जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने बताया, 'निशांत जेडीयू के 'सर्वमान्य नेता' हैं। उनके पास पार्टी को उसकी वर्तमान स्थिति से आगे ले जाने का एक स्पष्ट दृष्टिकोण है। वो अपने पिता की एक मजबूत राजनीतिक विरासत को साथ लेकर चलते हैं।'
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के विपरीत, जिन्हें अक्सर 'आक्रामक राजनीति' से जोड़ा जाता है, निशांत एक 'सौम्य' राजनेता के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं।
जेडीयू के एक सूत्र ने कहा, 'मीडिया और पार्टी पदाधिकारियों के साथ अपनी बातचीत में निशांत ने अब तक शांत और नपे-तुले अंदाज में अपने विचार व्यक्त किए हैं। वो पार्टी नेताओं को बताते हैं कि वह अपने जीवन में दो स्थायी प्रभावों 'मां के संस्कार' और 'पिता के काम' से निर्देशित होते हैं।' निशांत ने हाल ही में पार्टी के सभी प्रवक्ताओं के साथ एक बैठक भी की।
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद जेडीयू के सामने महिलाओं, महादलितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों के अपने कोर वोटबैंक को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती।
JDU अब तक जीविका दीदियों और आशा कार्यकर्ताओं जैसे सरकारी लाभार्थियों के भरोसे रही है। सत्ता से बाहर होने पर इन वर्गों का समर्थन पार्टी के प्रति बरकरार रखना कठिन होगा।
नीतीश के बेटे निशांत कुमार अब 'सर्वमान्य नेता' के रूप में उभर रहे हैं। वे कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी के भविष्य के रूप में देखा जा रहा है।
तेजस्वी यादव की आक्रामक शैली के विपरीत निशांत खुद को एक सौम्य राजनेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जो 'पिता के काम' और 'मां के संस्कार' की विरासत को साथ लेकर चल रहे हैं।
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