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Abhyuday Bharat News / Sun, Apr 19, 2026 / Post views : 1
मस्जिद पक्ष द्वारा अपने लिखित कथन में संशोधन की मांग करते हुए आस्था के सबूत न होने के आधार पर सिविल वादों को निरस्त करने की मांग की थी। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने यह आदेश लिखित कथन में तकनीकी खामियों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न होने के कारण दिया है। मस्जिद पक्ष ने अर्जी दाखिल कर अपने लिखित कथन में दो नए पैराग्राफ जोड़ने की अनुमति मांगी थी।
इन संशोधनों के जरिए मस्जिद पक्ष यह तर्क देना चाहता था कि वादी पक्ष ने आस्था के अस्तित्व के संबंध में कोई ठोस सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी है। बिना आस्था के प्रमाण के इस वाद का कोई वाद-कारण नहीं बनता, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद पक्ष द्वारा पूर्व में दाखिल किए गए लिखित कथन कानूनी रूप से पूर्ण नहीं थे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिखित कथन पर अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर नहीं थे। सीपीसी के आदेश छह नियम 14 और 15 के तहत आवश्यक सत्यापन की प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई थी। कोर्ट ने कहा कि मूल लिखित कथन ही कानून के अनुरूप नहीं है इसलिए उसमें संशोधन की मांग करना फिलहाल गलत और विचारहीन है। कोर्ट ने इन तकनीकी दोषों को दूर करने के लिए मस्जिद पक्ष द्वारा बाद में दाखिल एक अन्य अर्जी पर सुनवाई के लिए 15 मई की तिथि नियत की है। कई अन्य महत्वपूर्ण अर्जियां भी लंबित हैं, जिनमें शाही ईदगाह परिसर के सर्वे, आधिकारिक भाषा अधिनियम का पालन और विभिन्न पक्षों द्वारा पूजा की अनुमति से जुड़ी अर्जियां शामिल हैं।
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