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रिपोर्ट के मुताबिक त्रिवेदी के लिए ढाका में तारिक रहमान सरकार से सहमति मांगी जाएगी। 75 वर्षीय अनुभवी राजनेता को बांग्लादेश में भारत के दूत के तौर पर भेजने का फैसला विदेश मंत्रालय के राजनयिकों के लिए जवाबदेही का एक संदेश भी है। बता दें कि त्रिवेदी UPA शासनकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सदस्य के रूप में रेल मंत्री और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री थे। उन्होंने 12 फरवरी, 2021 को TMC से इस्तीफा दे दिया और 6 मार्च 2021 को BJP में शामिल हो गए।
त्रिवेदी की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब भारत और बांग्लादेश मोहम्मद यूनुस प्रकरण के बाद अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि दोनों देशों के संबंध तब खराब हुए, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को एक तख्तापलट के जरिए सत्ता से हटा दिया गया था और सेना तथा पुलिस दोनों ने ही प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था। अमेरिका समर्थित यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों में गिरावट आई थी।
हालांकि, दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति मोदी सरकार की ओर से एक स्पष्ट संकेत है कि वह प्रमुख देशों में भारत के दूत के तौर पर राजनीतिक नेताओं को भेजने के प्रति अनिच्छुक नहीं है। ये अत्यंत प्रतिष्ठित पद केवल भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के लिए ही आरक्षित नहीं हैं। जहां एक ओर पूर्व सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग ने 2019 से 2022 तक सेशेल्स में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया, वहीं ढाका में त्रिवेदी की नियुक्ति इस बात का भी संकेत है कि भारत अब अपने पड़ोसी देशों में राजदूत के तौर पर कद्दावर हस्तियों को भेजेगा और कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप में तो 'अच्छे दिनों वाले राजदूतों' का दौर अब खत्म हो चुका है।
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