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Abhyuday Bharat News / Fri, Apr 17, 2026 / Post views : 299
जनजातीय भाषाओं के संरक्षण पर वसंता महाविद्यालय वाराणसी में 17 अप्रैल, 2026 को राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ, कुलपति प्रो. बिभूति भूषण मलिक ने किया उद्घाटन

वाराणसी, 17 अप्रैल, 2026/
वसंत महिला महाविद्यालय (Vasanta College for Women) में आयोजित दो दिवसीय भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद ( ICSSR) प्रायोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज महाविद्यालय के सभागार में भव्य शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी का विषय “पूर्वी भारत में संथाली, मुंडारी एवं हो भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु सामुदायिक-आधारित डिजिटल एवं सांस्कृतिक नवाचार: बहुभाषी शिक्षा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के संदर्भ में” है।

कार्यक्रम का प्रारंभ मंगलाचरण, एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. अलका सिंह ने स्वागत भाषण में कहा कि यह संगोष्ठी जनजातीय भाषाओं एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल है। प्रबंधक श्री एस. एन. दुबे ने अपने आशीर्वचन में विषय की सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. (डॉ.) जय सिंह ने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए समुदाय-आधारित प्रयासों, डिजिटल नवाचार तथा शिक्षा के समन्वय को जनजातीय भाषाओं के संरक्षण हेतु अनिवार्य बताया। सह-संयोजक डॉ. प्रवीण कुमार ने प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए इस आयोजन को ज्ञान-विनिमय का सशक्त मंच बताया।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि Prof. Bibhuti Bhushan Malik (कुलपति, Rajendra University, ओडिशा) ने अपने उद्बोधन में कहा कि जनजातीय भाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि समुदाय की पहचान, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक अस्तित्व की आधारशिला हैं। उन्होंने इन भाषाओं के संरक्षण हेतु नीति, शिक्षा और तकनीक के समन्वित प्रयासों पर बल दिया।
मुख्य वक्ता प्रो. हरे राम तिवारी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर – IIT Kharagpur) ने अपने व्याख्यान में जनजातीय समाज और भाषा के समाजशास्त्रीय आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। विषयगत वक्ता प्रो. जय कांत तिवारी (काशी हिंदू विश्वविद्यालय – BHU) ने बहुभाषी शिक्षा, स्थानीय भाषाओं के संरक्षण तथा सामाजिक संदर्भों में उनकी उपयोगिता को रेखांकित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. अंजली बाजपेयी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के संदर्भ में बहुभाषिकता को शिक्षा के समावेशी विकास का आधार बताया। इस अवसर पर संगोष्ठी स्मारिका का विमोचन भी किया गया।
उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. जुही राय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सुजाता साहा द्वारा प्रस्तुत किया गया।
इसके पश्चात आयोजित तकनीकी सत्रों में “स्वदेशी भाषाओं के पुनर्जीवन हेतु सामुदायिक-आधारित डिजिटल नवाचार”, “सांस्कृतिक परंपराएँ, स्वदेशी ज्ञान एवं भाषाई स्थिरता” तथा “बहुभाषी शिक्षा एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ उसका सामंजस्य” जैसे विषयों पर विस्तृत विमर्श हुआ। विभिन्न सत्रों में देश के अनेक विश्वविद्यालयों एवं राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान एवं कर्नाटक—से आए प्रतिभागियों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
पहले दिन के सभी सत्रों में विद्वानों के बीच गंभीर, सार्थक एवं समसामयिक चर्चा देखने को मिली, जिसमें जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, डिजिटल नवाचार तथा बहुभाषी शिक्षा के विविध आयामों पर महत्वपूर्ण विचार उभरकर सामने आए।
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