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मनोरंजन न्यूज़ : भूत बंगला' मूवी रिव्यू,भूत बंगला' की कहानी.....

Abhyuday Bharat News / Fri, Apr 17, 2026 / Post views : 286

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प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी वो आइकॉनिक जुगलबंदी है, जिसने सुपरहिट 'भूल भुलैया' के साथ हिंदी सिनेमा में हॉरर-कॉमेडी को एक नई पहचान दी। इसके बाद कई फिल्मकारों ने इस फॉर्मूले को अपनाया और यह एक लोकप्रिय ट्रेंड बन गया। अब करीब 16 साल बाद जब यह जोड़ी इसी जॉनर में दोबारा साथ आई, तो उम्मीदों का जगना लाजमी था। लेकिन अफसोस, इस बार यह जुगलबंदी कुछ नया रचने की बजाय पुराने जादू को ही दोहराने में उलझी हुई नजर आती है। 'भूत बंगला' अपनी शुरुआत में हंसाती तो है, लेकिन फिर इसमें ताजगी और नयेपन की कमी झलकने लगती है।

'भूत बंगला' की कहानी

कहानी मंगलपुर नाम के एक रहस्यमयी गांव से शुरू होती है, जहां बरसों से किसी की शादी नहीं हुई। वजह है 'वधूसुर' नाम का राक्षस, जो हर बारात को तबाह कर दुल्हन को गायब कर देता है। इस खौफनाक रहस्य की जड़ें एक पुराने फ्लैशबैक में छिपी हैं। लंदन में रहने वाला अर्जुन आचार्य (अक्षय कुमार) अपनी बहन मीरा (मिथिला पारकर) की शादी के लिए एक सही जगह ढूंढ रहा है। उनके पिता (जीशु सेनगुप्ता) भी चाहते हैं कि मीरा की शादी अच्छे से हो। तभी अर्जुन को पता चलता है कि मीरा 500 करोड़ की संपत्ति और एक भव्य हवेली की वारिस है। अर्जुन उसी हवेली को शादी के लिए चुनता है और तैयारियों के लिए मंगलपुर पहुंचता है। यह वही गांव है, जहां लोग वधूसुर के डर से शादी के लिए गंगा पार जाते हैं।

अर्जुन मंगलपुर पहुंचता है। लोगों की बातों और कहानियों को वह अंधविश्वास मानता है। लेकिन हवेली में केयरटेकर शांताराम (असरानी), वेडिंग प्लानर जगदीश केवलरामानी (परेश रावल) और उसके भतीजे सुंदर (राजपाल यादव) के साथ अजीब और डरावनी घटनाएं होने लगती हैं। हालात तब बदलते हैं जब अर्जुन खुद एक भयानक अनुभव का सामना करता है और उसे यकीन हो जाता है कि मंगलपुर सच में शापित है।

अर्जुन के इस सफर में वामिका गब्बी भी उससे जुड़ती है, जबकि मनोज जोशी, राजेश शर्मा, भावना पानी और ज़ाकिर हुसैन जैसे किरदार कहानी में अलग-अलग परतें जोड़ते हैं। जैसे-जैसे कहानी अतीत में गहराई तक जाती है, अर्जुन को न सिर्फ वधूसुर का सच पता चलता है, बल्कि खुद से जुड़ा एक ऐसा डरावना राज भी सामने आता है, जिससे बच निकलना उसके लिए आसान नहीं होता।

भूत बंगला' मूवी रिव्यू

निर्देशक प्रियदर्शन फिल्म की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में करते हैं, जहां फर्स्ट हाफ कुछ हद तक मनोरंजन देता है। अक्षय कुमार, असरानी, राजपाल यादव और परेश रावल की मौजूदगी नॉस्टैल्जिया के साथ कॉमेडी भी पैदा करती है। लेकिन यह असर ज्यादा देर टिक नहीं पाता। सेकंड हाफ में कहानी बिखर जाती है। प्रियदर्शन अपने आजमाए हुए टेम्पलेट पर चलते हैं, लेकिन लंबे रनटाइम में जरूरत से ज्यादा मसाले डालने की वजह से फिल्म का संतुलन बिगड़ जाता है।

फिल्‍म में दुल्हन के गायब होने वाला ट्रैक साल 1979 में रिलीज फिल्‍म 'जानी दुश्मन' की याद दिलाता है, जबकि फ्लैशबैक 'भूल भुलैया' से प्रेरित लगता है। असल में आइडिया मजबूत था, लेकिन कमजोर लेखन इसे एक सुसंगत कहानी में नहीं बदल पाता। कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे अलग-अलग सोचे गए हों और बाद में जोड़ दिए गए हों, जिससे हवेली में होने वाली घटनाएं बेतरतीब और अतार्किक महसूस होती हैं।

हालांकि, प्रियदर्शन अपनी पसंदीदा स्टार कास्ट के साथ कॉमिक टाइमिंग साधने की कोशिश करते हैं, लेकिन कई जगहों पर कॉमेडी फूहड़ और जरूरत से ज्यादा लाउड हो जाती है। प्री-क्लाइमैक्स में वधूसुर के साथ फाइट सीन में वीएफएक्स प्रभावित करते हैं, लेकिन क्लाइमैक्स तक आते-आते एक संतोषजनक, होलसम एंटरटेनर बनने की कमी साफ महसूस होती है।

संगीत, जो हॉरर-कॉमेडी फिल्‍मों की की जान है, यहां कमजोर है। प्रीतम का म्यूजिक औसत रह जाता है, जहां ‘रामजी भला करें’ जैसे गाने भी खास असर नहीं छोड़ पाते।
अभिनय की बात करें, तो अक्षय कुमार अपनी कॉमिक टाइमिंग के साथ अपने किरदार को मनोरंजक बनाते हैं। फिल्म में वे दोहरी भूमिका में हैं और उनका गेटअप चौंकाने वाला साबित होता है। कॉमेडी को आगे बढ़ाने में असरानी, राजपाल यादव और परेश रावल की यह चौकड़ी अपने किरदारों के जरिए कई जगहों पर नॉस्टाल्जिक अनुभव देती है। खास तौर पर यह फिल्म असरानी जैसे सीनियर कलाकर के लिए ट्रिब्यूट मानी जा सकती है।

फिल्‍म के बाकी किरदारों में वामिका गब्बी को बहुत ही कम स्क्रीन टाइम मिला है। तब्बू जैसी सीनियर और अनुभवी एक्ट्रेस को वेस्ट कर दिया गया है। मिथिला पालकर, राजेश शर्मा, जीशु सेनगुप्ता, जाकिर हुसैन जैसे तमाम कलाकारों ने अपने रोल्स को बखूबी निभाया है।

क्यों देखें- हॉरर-कॉमेडी के हार्डकोर फैन हैं, अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी के दीवाने हैं, तो यह फिल्‍म देख सकते हैं।

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#Films News

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