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आनंद महिंद्रा ने कहा कि हाल के संघर्ष एक कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं। सस्ते आत्मघाती ड्रोन उन्हें नष्ट करने के लिए भेजे गए अवरोधकों की तुलना में बहुत कम लागत में तैयार किए जाते हैं।
हमलावर को जीतना जरूरी नहीं है। उसे बस अपने पक्ष में गणितीय संतुलन बनाए रखना है। लेजर बहुत सस्ते और सटीक निशाना लगाने में माहिर होते हैं, लेकिन वे एक बार में केवल एक ही लक्ष्य को निशाना बनाते हैं। ड्रोनों के झुंड के खिलाफ, यह एक समस्या है।
एचपीएम में यह सीमा नहीं है। यह एक बिंदु को नहीं, बल्कि एक विशाल क्षेत्र को कवर करता है। एचपीएम 100 से अधिक ड्रोन्स पर हमला कर सेकेंड में समाप्त कर सकता है।
उन्होंने कहा कि दोनों ही प्रणालियां गतिज प्रणालियों (मिसाइलें, तोपें) का पूरक हैं, न कि उनका प्रतिस्थापन, वायु रक्षा का भविष्य स्पष्ट रूप से बहुआयामी है, जिसमें प्रत्येक तकनीक एक अलग भूमिका निभाती है।
भारत के लिए, एचपीएम बहुत प्रासंगिक है और प्रतिक्रियात्मक रूप से समाधान आयात करना कोई रणनीति नहीं है।
स्वदेशी, एआई-सक्षम एचपीएम और लेजर क्षमता का प्रारंभिक विकास करना महत्वपूर्ण है।
हमारे पास प्रतिभा है। हमें बस त्वरित खरीद, धैर्यवान पूंजी और ऐसे संस्थानों की आवश्यकता है जो डीप-टेक स्टार्टअप्स को आगे बढ़ने दें।
ड्रोन के झुंड को एक झटके में खात्मा: यह एक साथ कई ड्रोन पर प्रहार कर सकता है, जो पारंपरिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों के लिए मुश्किल है।
स्वदेशी तकनीक: भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) इसे विकसित कर रहा है, जल्द ही इसके तैयार होने का अनुमान है।
उच्च दिशात्मकता: यह शंक्वाकार हॉर्न एंटीना का उपयोग करके सटीक दिशा में माइक्रोवेव किरणें भेजता है और दुश्मन के ड्रोन को नष्ट कर देता है।
किफायती ड्रोन: मिसाइल-आधारित रक्षा प्रणाली की तुलना में, HPM एक लागत-प्रभावी समाधान है, क्योंकि इसमें बार-बार गोला-बारूद की आवश्यकता नहीं होती।
दूर से ही कर देता है निष्क्रिय: शुरुआती परीक्षणों में, इस सिस्टम ने 1 किमी से अधिक की दूरी से छोटे ड्रोन को सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया है।
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