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SC के SIR पर फैसले से चुनाव आयोग बहुत खुश हुआ, असली वजह हैं, संविधान का अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व कानून

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ABN NEWS :- देश दुनिया : SC के SIR पर फैसले से चुनाव आयोग बहुत खुश हुआ, असली वजह हैं, संविधान का अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व कानून

Abhyuday Bharat News / Wed, May 27, 2026 / Post views : 11

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इस पूरे मामले की गुत्थी सुलझाने में दो कानूनी प्रावधान सबसे ज्यादा मददगार बने, वो हैं भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950

नई दिल्ली: एक बात तो सबको माननी पड़ेगी, कि देश में जब कभी भी कानून और प्रशासन को लेकर पेंच फंसता है, संविधान ही राह दिखाता है। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। और सुप्रीम कोर्ट ने इसका हल संविधान में ही खोजा।

इस पूरे मामले की गुत्थी सुलझाने में दो कानूनी प्रावधान सबसे ज्यादा खास रहे, मददगार बने। वो हैं भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950। यही दोनों आधार SIR को कानूनी मजबूती देने में सबसे खास कड़ी साबित हुए । इस लीगल स्टोरी के जरिए हम शीर्ष अदालत के फैसले के इस पहलू पर नजर डालते हैं। 

संविधान का अनुच्छेद 326 का क्या कहता है

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 कहता है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।

  • इसका अर्थ है कि भारत का हर नागरिक जिसकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक है और जो कानून द्वारा अयोग्य घोषित नहीं किया गया है, वह मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार रखता है।

यानीसंविधान का यह अनुच्छेदमतदान का आधार तय करता है—नागरिकता, उम्र और वैधानिक योग्यता। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज करने और अयोग्यता तय करने का काम कानून और चुनाव आयोग की प्रक्रिया के अनुसार होगा। और यही बात शीर्ष अदालत ने मानी भी है। यहीं से चुनाव आयोग की भूमिका मजबूत हो जाती है।चुनाव आयोग के खुश होने की एक बड़ी वजह यही संवैधानिक प्रावधान बना है।जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और इसकी भूमिका क्या है

  • यदि मैं कहूं कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) चुनावी प्रक्रिया की जीवन रेखा है तो गलत नहीं होगा।

  • देश के तमाम चुनाव इस अधिनियम के तहत ही कराए जाते हैं।

  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत ही मतदाता सूची तैयार करने, संशोधित करने, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को तय किया गया है।

  • इस अधिनियम की धारा 21(3) चुनाव आयोग को SIR यानि विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्ति देती है। चुनाव आयोग आवश्यकता पड़ने पर मतदाता सूची की व्यापक जांच कर सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सूची में केवल पात्र मतदाता ही बने रहें।

  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 और 19 यह भी तय करती हैं कि व्यक्ति मतदाता बनने के योग्य है या नहीं। यदि मतदाता सूची में उसका नाम शामिल भी है तो किन परिस्थितियों में उसका नाम हटाया जा सकता है।

इसी कानूनी ढांचे का हवाला देते हुए चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि उसका उद्देश्य नागरिकता तय करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना है। और सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज नहीं किया, क्योंकि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधान चुनाव आयोग को यह शक्ति देते हैं। भले ही नागरिकता तय करना सरकार का काम है, पर चुनाव आयोग यदि नागरिकता से जुड़े कागजों की मांग करें तो....कागज तो दिखाने ही पड़ेंगे

सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर क्या कहा है

मतदाता सूची की शुद्धता को लोकतंत्र की बुनियादी जरुरत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि चुनाव आयोग सही दिशा में है। अदालत ने कहा कि यदि चुनाव आयोग को फर्जी, मृत या अयोग्य मतदाताओं की जांच का अधिकार नहीं होगा, तो निष्पक्ष चुनाव कैसे कर सकेंगे? ऐसे में निष्पक्ष चुनावों की अवधारणा बेमानी है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म होना नहीं है। नागरिकता और मतदाता पंजीकरण दो अलग कानूनी विषय हैं। नागरिकता तय करना सरकार का काम है, लेकिन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के तहत चुनावों को लेकर चुनाव आयोग को जो ताकत मिली है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की कोशिश :लोकतंत्र और कानून के बीच संतुलन साधने की

  • बिहार में SIR से जुड़े विवाद ने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हुआ था...नागरिकता की जांच को लेकर चुनाव आयोग कौन ? और वोटर लिस्ट की कठोर जांच क्यों ?

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह शीशे की तरह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में चुनावों की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखनेके लिए केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि सही और निष्पक्ष मतदाता सूची भी अहम है।

  • अनुच्छेद 326 नागरिकों को मतदान करने और इस प्रक्रिया से जुड़ने का संवैधानिक ढांचा देता है

  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 उस अधिकार को लागू करने की प्रक्रिया और बुनियादी नियम तय करता है।

और यह दोनों मिलकर चुनाव आयोग को वह कानूनी ताकत देते हैं जिसके आधार पर SIR जैसी कार्रवाई संभव होती है। और यही कारण है कि बिहार SIR केस में ये दोनों प्रावधान चुनाव आयोग की सबसे बड़ी कानूनी ढाल बनकर उभरे। चुनाव आयोग की खुशीसुप्रीम कोर्ट के फैसलेके तुरत बाद की मीडिया ब्रीफिंग में भी दिखी।

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