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: जानिए : एससी/एसटी आरक्षण में उप-वर्गीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला

Admin / Fri, Aug 2, 2024 / Post views : 390

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ABN EXPRESS NEWS 24x7 नई दिल्ली। शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक रोजगार में सीटें आरक्षित करने के उद्देश्य से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देने वाले सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार के फैसले के व्यापक परिणाम होंगे. यह राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए निर्धारित कोटे के भीतर उप-समूहों के लिए सीटें आरक्षित करने की अनुमति देता है, जो उप-समूह की अधिक पिछड़ी या वंचित स्थिति पर आधारित है. सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने 6:1 के फैसले में यह फैसला सुनाया. पीठ के 565 पन्नों के फैसले में छह अलग-अलग राय शामिल हैं. भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा स्वयं और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा के साथ ही न्यायमूर्ति बीआर गवई, विक्रम नाथ, पंकज मिथल और सतीश चंद्र शर्मा द्वारा लिखे गए फैसले बहुमत की राय हैं. न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के फैसले में एकमात्र असहमतिपूर्ण राय निहित है. गवई, नाथ, मिथल और शर्मा ने अपने निर्णयों में यह भी सुझाव दिया कि राज्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण में “क्रीमी लेयर” के सिद्धांत को शामिल करे, जिसका उद्देश्य समूह के भीतर धनी और अधिक समृद्ध सदस्यों को लाभों से बाहर रखना है. चूंकि क्रीमी लेयर सिद्धांत का अनुप्रयोग पीठ के समक्ष प्रश्नों में से एक नहीं था और अदालत की सुनवाई के दौरान इस बारे में कोई तर्क नहीं दिया गया था, इसलिए इन सुझावों में कानूनी प्रवर्तनीयता का अभाव है
सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ: (बाएं से दाएं) न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी, न्यायमूर्ति एसआर गवई, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एससी शर्मा
1975 में आरक्षण का फैसला लिया वापस यह निर्णय 1975 में पंजाब सरकार के उस निर्णय से लिया गया है, जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए राज्य के 25% आरक्षण को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था, इसमें आधा बाल्मीकि समुदाय और मज़हबी सिखों के लिए और आधा अन्य अनुसूचित जातियों के लिए रखा गया था. यह 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक प्रभावी रहा, जिसने अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण के विरुद्ध निर्णय दिया. परिणामस्वरूप, 2006 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब की अधिसूचना को रद्द कर दिया. पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए 2004 के निर्णय में कहा गया था कि राज्य समूहों को अनुसूचित जातियों के रूप में वर्गीकृत नहीं कर सकते क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति के लिए आरक्षित एक शक्ति है. इसने इस बात पर जोर दिया कि अनुसूचित जाति श्रेणी समरूप है, इसलिए कोई भी उप-वर्गीकरण समानता के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

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