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ABN NEWS :- देश दुनिया : ईरान के इस शहर में दर्द की इंतेहा, सूरज ढलते ही मातम, बच्चों की कब्रों के साथ बीत रही रात,खामोश हुआ शहर ...

Abhyuday Bharat News / Sat, Mar 21, 2026 / Post views : 158

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ईरान के मिनाब शहर का कब्रिस्तान टूटे सपने और अधूरी जिंदगियों के अनकहे दर्द का दस्तावेज बन गया है। 28 फरवरी को इस शहर में मिसाइल हमले में प्राइमरी स्कूल के 168 बच्चे मारे गए थे।

तेहरान: ईरान के मिनाब शहर का एक कब्रिस्तान इन दिनों सिर्फ दफनाए गए बच्चों की जगह नहीं, बल्कि टूटे हुए सपनों, अधूरी जिंदगियों और अनकहे दर्द का दस्तावेज बन गया है। हर रोज सूरज ढलते ही यहां अजीब सी हलचल शुरू होती है। यह किसी उत्सव की नहीं, बल्कि उस खामोश मातम की है, जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल है। 28 फरवरी को मिसाइल हमले में प्राइमरी स्कूल के 168 बच्चे मारे गए थे। कब्र के पास रात बिताने वाले लोग उन्हीं बच्चों के घरवाले हैं।

बेटी से ऐसे बात करती हैं, जैसे वह कब्र में सुन रही हो

अमीना करीमी की 7 साल की बेटी लैला 28 फरवरी के हमले में मारी गई थी। अब अमीना हर रात बेटी की कब्र के पास आती है। वह फुसफुसाते हुए कुरान पढ़ती हैं, दुआ करती है और अपनी बेटी से ऐसे बात करती हैं जैसे वह सुन रही हो। अमीना कहती है, 'इस बार रमजान मेरे लिए सिर्फ दुख लेकर आया। कभी-कभी मैं उसकी हंसी याद करती हूं, उसका स्कूल जाना, उसके सपने और बस आंखें बंद कर लेती हूं।' ठंडी रातों में भी अमीना वहीं बैठी रहती हैं। उनके लिए मोमबत्ती की हल्की रोशनी ही अब एकमात्र सहारा है।

7 साल के बेटे का खेलना, हंसना भूल नहीं पा रही रेजा

रेजा जारेई अपने 7 साल के बेटे अली की कब्र के पास पूरी रात बिताती हैं। वह कहती है, 'मैं उसके छोटे-छोटे पलों को याद करती हूं। उसका खेलना, दोस्तों के साथ हंसना। मुझे उसकी जिंदगी की छोटी-छोटी बातें याद हैं। वह कैसे स्कूल जाता था। उसके दोस्त ... ' उन्होंने आगे कहा, 'यहां रात एकदम शांत होती है, सिवाय दुआओं और
कुरान की आयतों के।

'दर्द तो कम नही होता, पर सहना आसान हो जाता है'

40 साल की रेहाना अकबरी फार ने अपनी S साल की बेटी जेहरा को खो दिया। रेहाना कहती हैं, 'मैं कभी-कभी कब्र के पास लेट जाती हूं और अपनी आंखें बंद कर लेती हूं। उसे अपने करीब महसूस करने की कोशिश करती हूं।' रेहाना ने बताया कि आसपास मौजूद दूसरे परिवारों की आवाजें, बातचीत, पाठ और यादें साझा करना, रातों को थोड़ा कम असहनीय बना देती हैं। हम उन खेलों के बारे में बात करते हैं जो हमरे बच्चों को पसंद थे, और हम उनकी हंसी के पलों को फिर से जीते हैं। यह सब रात को थोड़ा कम अकेलापन भरा बना देता है।


दुखों की काली रातों के गवाह बच्चे भी हैं

दुखों की इन काली रातो के गवाह बच्चे भी है, जो अपने भाई-बहनों या रिश्तेदारों को खो चुके हैं। वे सीख रहे है कि असहनीय दुख के साथ कैसे जिया जाता है। एक ऐसी सीख, जो शायद उनकी उम्र के लिए बहुत जल्दी है। रमजान में सहरी में कुछ लोग थोड़ा-बहुत खाते, चाय पीते, लेकिन ज्यादातर के लिए यह सिर्फ एक रस्म बनकर रह गया था। फिर धीरे-धीरे लोग अपनी चीजें समेटते, मोमबत्तिया बुझाते और कब्रिस्तान खाली होने लगता। लेकिन यह खालीपन अस्थायी है। क्योंकि जैसे ही अगली शाम ढलेगी, ये परिवार फिर लौट आएंगे, अपने बच्चों के पास, अपने दर्द के साथ और उस उम्मीद के साथ कि शायद साथ बैठने से, याद करने से, यह बोझ थोड़ा हल्का हो सके।

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