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नई दिल्ली : शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जिसका... सरकारी दफ्तरों और दफ्तरों मे अक्सर कुर्सियों से नदारद.. सरकारी बाबू लोगों की मनमानी से उसका पाला न पड़ा हो। माहौल ऐसा हो गया है कि भारत में कई बार लोगों को लगता है कि सरकारी दफ्तरों में उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। ऐसे में ... साल 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार यानी RTI Act आम नागरिक के हाथ में ऐसा कानूनी हथियार बन गया जिसने सरकार से सवाल पूछने का अधिकार दे दिया। और इस हथियार से न केवल छोटे सरकारी बाबू ...बल्कि बड़े बड़े नेता..मंतरी...संतरी सब डरने लगे। आज हम अपनी लीगल स्टोरी में इसी सूचना के अधिकार से जुड़े कानूनों के बारे बताएंगे सब कुछ ...
देश में कहा जाए तो लाखों सरकारी महकमों के दफ्तरों का हाल एक जैसा है। महीनों तक फाइलें अटकी रहती हैं, योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, सड़कें अधूरी रहती हैं और शिकायतों का जवाब तक नहीं दिया जाता। ऐसे मेंसूचना के अधिकार की आवश्यकतामुख्य रूप से सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने, भ्रष्टाचार को रोकने और नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए महसूस हुई। दरअसल यह कानून आम जनता को यह जानने का एक शक्तिशाली अधिकार देता है कि सरकार कैसे काम कर रही है और उनके द्वारा दिए गए टैक्स के पैसों का इस्तेमाल कहाँ हो रहा है?
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005ऐसा कानून है जो हर भारतीय नागरिक को सरकारी संस्थाओं से जानकारी मांगने का अधिकार देता है। इसके तहत नागरिक किसी भी सरकारी विभाग, मंत्रालय, पंचायत, नगर निगम, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल या सरकारी फंड पाने वाली संस्था से जानकारी मांग सकते हैं। यदि इस कानून का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो कोई भी जान सकता है..
आपके इलाके में सड़क क्यों नहीं बनी
आपका आवेदन क्यों स्वीकार नहीं हुआ है
दफ्तर में आपकी फाईल कहां अटकी है
सरकारी भर्ती या चयन प्रक्रिया की स्थिति
कौन सी सरकारी योजनाएं हैं
सरकारी योजनाओं का लाभ किसे मिला
आपकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई
सड़क, बिजली या पानी के काम में कितना पैसा खर्च हुआ
दरअसल...इस कानून ने आम आदमी को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक सशक्त हथियार मुहैया कराया है। अगर लोग सही तरीके से जानकारी मांगें तो सरकारी विभाग जवाब देने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं जानता हूं कि... देश में कई ऐसे मामले सामने आए जहां सिर्फ एक RTI आवेदन ने बड़े खुलासे किए। कई राज्यों में अधूरी सड़क परियोजनाओं, फर्जी लाभार्थियों और सरकारी लापरवाही का सच RTI के जरिए सामने आया। सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर भी लोग अपने अनुभव शेयर करते हैं कि कैसेसूचना के अधिकारने उनकी सालों पुरानी मुश्किल दूर की।
आम नागरिकों से जुड़े अधिकार के प्रावधानों को गढ़ते वक्त यह ध्यान रखा गया कि आम आदामी को हर तरीके से सहजता हो...चाहे आवेदन करने में या फिर फीस देने में। RTI आवेदन देना बेहद आसान है।
कोई भी कागज पर आवेदन , विभाग के Public Information Officer को दे सकता है।
आवेदन हिंदी, अंग्रेजी या स्थानीय भाषा में दिया जा सकता है।
आवेदन में सिर्फ यह लिखना जरूरी होता है कि आपको कौन सी जानकारी चाहिए।
कानून के अनुसार आवेदक से यह नहीं पूछा जा सकता कि वह जानकारी क्यों मांग रहा है।
सामान्य तौर पर RTI आवेदन के लिए 10 रुपये फीस ली जाती है।
हालांकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को फीस से छूट मिलती है।
RTI कानून के तहत आमतौर पर 30 दिनों के भीतर जानकारी देना जरूरी होता है।
मामला जीवन और स्वतंत्रता से जुड़ा हो तो 48 घंटे के अंदर जवाब देना पड़ सकता है।
आवेदन ऑनलाईन भी किया जा सकता है।
सबसे प्रभावशाली नागरिक हथियार
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं है। असली लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सरकार से सवाल पूछते हैं और जवाब मांगते हैं। आज एक साधारण RTI आवेदन किसी भी आम आदमी को ताकतवर बना सकता है। यही वजह है किसूचना का अधिकार कानूनको भारत के सबसे प्रभावशाली नागरिक अधिकारों में गिना जाता है।
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