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मध्य प्रदेश न्यूज : सीहोर के खेरी में होली पर 'बर्तन प्रथा' बंद करने का निर्णय, नियम तोड़ने पर 5000 रुपए का लगेगा जुर्माना

Abhyuday Bharat News / Fri, Feb 27, 2026 / Post views : 256

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सीहोर जिले के खेरी में चंद्रवंशी खाती समाज ने बर्तन प्रथा बंद करने का निर्णय लिया है। इस नियम को तोड़ने वाले पर पांच हजार रुपए का जुर्माना लगेगा। बर्तन प्रथा के अंतर्गत लोग होली पर एक-दूसरे को बर्तन देते थे।

Bartan Pratha Closed On Holi

सीहोर: अखिल भारतीय चंद्रवंशी खाती समाज ने सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया है। गुरुवार को ग्राम पंचायत खेरी स्थित हनुमान मंदिर में समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि होली के पर्व पर बरसों से चली आ रही 'बर्तन प्रथा' को अब पूरी तरह समाप्त किया जाएगा। समाज के इस निर्णय का उल्लंघन करने वाले परिवार पर ₹5000 का आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान भी किया गया है

फिजूलखर्ची रोकने के लिए कड़ा फैसला

बैठक में ग्राम खेरी के सरपंच प्रतिनिधि धनपाल सिंह वर्मा गांव के पटेल मेहरबान सिंह वर्मा के नेतृत्व में समाज के वरिष्ठजनों और प्रबुद्ध नागरिकों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि त्यौहारों के नाम पर बढ़ती फिजूलखर्ची और उपहारों के लेन-देन की प्रतिस्पर्धा से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। 'बर्तन प्रथा' जैसी कुरीतियां समाज में भेदभाव पैदा करती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए समाज ने अब इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।

ग्रामीणों ने किया फैसले का स्वागत

वहीं, ग्राम पंचायत खेरी के इस निर्णय की आसपास के क्षेत्रों में भी सराहना हो रही है। ग्रामीणों का मानना है कि इस प्रकार के कड़े निर्णयों से न केवल समाज में समानता आएगी, बल्कि युवाओं को भी फिजूलखर्ची से दूर रहने की प्रेरणा मिलेगी। समाज के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि का उपयोग समाज के सामूहिक कार्यों और विकास में किया जाएगा।

समाज के विकास के लिए पुरानी और बोझिल परंपराओं को त्यागना आवश्यक है। होली खुशियों का त्यौहार है, इसे सादगी और प्रेम से मनाया जाना चाहिए। यह फैसला समाज के हर वर्ग के हित में लिया गया है।

क्या है बर्तन प्रथा

गौरतलब है कि होली के मौके पर यह सालों से चली आ रही प्रथा है। इस प्रथा के अंतर्गत होली पर एक परिवार दूसरे परिवार को बर्तन देते थे और बर्तन लेते थे। इससे परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा था। इसके बाद समाज के लोगों ने इसे बंद करने का फैसला किया है।

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