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: गुमनामी के अँधेरे में खो गया शहीदे आजम भगत सिंह का जन्मदिवस 28 सितम्बर...?

Admin / Sun, Sep 29, 2024 / Post views : 194

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अभ्युदय भारत न्यूज़  ABN EXPRESS NEWS 24x7
छत्तीसगढ़ 

देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर शहीदों की शहादत को गुमनामी के अँधेरे में भुलाया जा रहा है | 28 सितम्बर का दिन भी इस अँधेरे में खो गया |

देश के करोड़ों युवा पीढ़ी की बड़ी संख्या 28 सितम्बर के महत्त्वपूर्ण दिन से अपरिचित है, शायद यही कारण है कि देश के करोड़ों  युवाओं और आम जनता के लिए 28 सितंबर का दिन रोजमर्रा के आम दिनों की तरह बीत गया |  देश की आजादी के सपने को पूरा करने के लिए हँसते - हँसते फांसी के फंदे को चूमकर वतन के लिए शहीद होने वाले शहीदे आजम भगत सिंह का जन्म दिवस 28 सितम्बर को था | गिने चुने संस्थाओ और चंद लोगों ने शहीद भगत सिंह की फोटो पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया होगा | पर क्या शहीद भगत सिंह की शहादत का इतना ही महत्व रह गया था,  जो आज गुमनामी के अँधेरे में खो गया  है | 
  • स्वंतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अपने रक्त का हर कतरा कुर्बान कर देने वाले अमर शहीदों की शहादत को आजादी के बाद पर्याप्त सम्मान और जगह क्यों नहीं मिली ...?
 
  • क्यों उनकी शहादत और अमर कहानियों को  युवा पीढ़ी के समक्ष नहीं लाया गया...?
 
  • क्यों देश की शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रमों  में उनकी  शहादत की गाथाओं को शामिल नहीं किया गया...?
 
  • क्यों अमर शहीदों के बलिदान और त्याग को छात्र - छात्राओं एवं युवाओं  के सामने आदर्श प्रतिमान के रूप में सामने नहीं लाया गया ...?
ऐसे बहुत से सवाल आजादी के बाद से अब तक देश की जनता के सामने लाया जाना चाहिए था, किन्तु ऐसे सवालों के जवाब किसी भी सरकार ने नहीं दिया है | 
शहीद भगत सिंह की पूर्ण सच्चाई से देश की जनता वाकिफ नहीं है | देश के अंधिकांश लोग आज भी ये सोचते है की अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और उनके साथी अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ रहे थे और उनका उद्देश्य भारत से अंग्रेजों को भगाना था, और यहीं हमें इतिहास में बताया गया है |  असल में देश की आजादी के लिए लड़ने वाले अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और उनके साथी अंग्रेजों से नहीं बल्कि दमनकारी व्यवस्था से लड़ रहे थे, वो व्यवस्था जिसमें बहुसंख्यक जनता का शोषण होता था | अंग्रेजों के चाटुकार जमींदार, नवाब , छोटे छोटे रियासतों के राजाओं, सामंतो के द्वारा अंग्रेजी सल्तनत के इशारे पर आम जनता का शोषण किया जाता था | अंग्रेजी सल्तनत में भी देश की आजादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों के विरुद्ध अंग्रेजों के चाटुकार जमींदार, नवाब , छोटे छोटे रियासतों के राजाओं, सामंतो के द्वारा साथ नहीं दिया गया अन्यथा देश की आजादी बहुत पहले ही मिल सकती थी |  शहीदे आजम भगत सिंह ने अपनी फांसी से पहले अपनी माँ को लिखे आखिरी पत्र में कहते है कि "....... मुझे फांसी पर चढ़ा दिया जायेगा , दस- पन्द्रह वर्षों में अंग्रेज हमारा देश छोड़ कर चले जायेंगे, अंग्रेजों के चहेते इस देश की सत्ता सम्हालेंगे| लोगों की समस्या ज्यों की त्यों बनी रह जाएगी | कई साल अफरा - तफरी में बीतेंगे | इसके बाद लोगो को मेरी याद आयेगी |" पर दुर्भाग्य है कि शहीदे आजम भगत सिंह तथा हजारों अनाम शहीदों ने जो सोचकर अपना बलिदान दिया था, देश की आजादी के 78 वर्ष बीतने के बाद भी देश के लाखों- करोड़ों लोगों को न्याय से वंचित होना पड़ रहा है आज भी देश की  बेटियां सुरक्षित नहीं है |  देश में  बालिकाओं और महिलाओं के ऊपर अनगिनत अनाचार की खबरे सुनने को मिलती है | देश का युवा रोजगार के लिए भटक रहा है | देश की समूची युवा पीढ़ी को आधुनिकता की आड़ में नशे के गर्त में डाला जा रहा है | अनेक राज्यों में आये दिन जातिवादी, संप्रदायवादी, क्षेत्रवादी, नस्लवादी दंगे - फसाद हो रहे है  | निश्चित रूप से  ये भारत आजादी के दीवानों का भारत नहीं है, जिसकी आजादी का सपना देखते हजारों क्रांतिकारियों ने अपना सर्वस्व त्याग कर देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दे दिया | देश के अमर शहीदों की शहादत को युवा पीढ़ी के सामने लाने के लिए वर्षों से कार्यरत "राष्ट्रीय वन्देमातरम " - राष्ट्र प्रथम अभियान, भारत जनशक्ति संगठन, भारत युवा शक्ति संगठन, भारत  छात्र शक्ति संगठन, शहीद भगत सिंह विचार क्रांति फाउन्डेशन ने बीड़ा उठाया है | "राष्ट्रीय वन्देमातरम " जनशक्ति  एवं शहीद भगत सिंह विचार क्रांति फाउन्डेशन ने शहीदे आजम भगत सिंह की जयंती पर उनकी शहादत को नमन किया है |     

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