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शिक्षा : नट की भूमिका में विद्यार्थी : संतुलन की रस्सी पर शिक्षा, स्वाध्याय और अपेक्षाओं का विमर्श

Abhyuday Bharat News / Thu, May 21, 2026 / Post views : 222

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- बदलती शैक्षिक संरचना और विद्यार्थी जीवन का बहुआयामी विश्लेषण

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )

1. प्रस्तावना : बदलते समय में विद्यार्थी का संसार

सुबह विद्यालय, दोपहर कोचिंग, रात्रि स्वाध्याय और इनके मध्य समय से भी अधिक तीव्र गति से दौड़ता एक विद्यार्थी—यह दृश्य आज असामान्य नहीं रहा है। वह केवल पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं कर रहा, बल्कि अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धाओं और उपलब्धियों के अदृश्य मानचित्र पर स्वयं को खोजने का प्रयास भी कर रहा है। उसकी दिनचर्या में पुस्तकों का भार जितना दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक अदृश्य भार उसके मन और चेतना पर उपस्थित रहता है।

एक नट जब पतली रस्सी पर अपना पहला कदम रखता है, तब उसके सामने केवल दूरी नहीं होती; उसके सामने संतुलन की चुनौती भी होती है। उसका एक क्षण का असंतुलन उसे डगमगा सकता है, जबकि उसका धैर्य और एकाग्रता उसे लक्ष्य तक पहुँचा सकते हैं। समकालीन विद्यार्थी भी कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहा है—एक ओर विद्यालय, दूसरी ओर कोचिंग और तीसरी ओर स्वाध्याय; इनके मध्य वह अपने भविष्य का संतुलन खोज रहा है।

मानव जीवन की प्रत्येक यात्रा संतुलन की अपेक्षा करती है। प्रकृति का समस्त विधान इसी सिद्धांत पर आधारित है—दिन और रात्रि, गति और विराम, विचार और कर्म। जब संतुलन विचलित होता है, तब व्यवस्था होते हुए भी दिशा धूमिल होने लगती है। शिक्षा भी जीवन की ऐसी ही यात्रा है, जिसका उद्देश्य केवल ज्ञान-संचय नहीं, बल्कि विचार, विवेक, संवेदना और व्यक्तित्व का परिष्कार है।

भारतीय ज्ञान-परंपरा में शिक्षा को मात्र सूचना-प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि चेतना-विस्तार का माध्यम माना गया है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र — “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” — अर्थात् “सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ” — शिक्षा की उदार एवं व्यापक दृष्टि को अभिव्यक्त करता है।

आज का विद्यार्थी केवल शिक्षार्थी नहीं, बल्कि अनेक भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों का संवाहक बन चुका है। वह परिवार की आशाओं का केंद्र है, प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं का अभ्यर्थी है, प्रौद्योगिकी-प्रधान युग का सहभागी है तथा अपने भविष्य-निर्माण का उत्तरदायी भी है। इस प्रकार उसका जीवन केवल उपलब्धियों की यात्रा नहीं, बल्कि संतुलन की निरंतर साधना भी है।

2. नट और विद्यार्थी : संघर्ष का जीवंत प्रतीक

नट की कला केवल कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और संतुलन की साधना है। उसकी दृष्टि लक्ष्य पर केंद्रित रहती है और उसका प्रत्येक चरण सजगता की माँग करता है। उसकी सफलता केवल रस्सी पार करने में नहीं, बल्कि संभावित पतन के मध्य स्वयं को स्थिर बनाए रखने में निहित होती है।

समकालीन विद्यार्थी की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। विद्यालय, कोचिंग और स्वाध्याय उसके जीवन की तीन प्रमुख दिशाएँ हैं। यदि इनमें से किसी एक दिशा का भार अत्यधिक बढ़ जाए, तो संतुलन की रस्सी डगमगाने लगती है। इसलिए विद्यार्थी के समक्ष केवल अध्ययन का प्रश्न नहीं, बल्कि संतुलित अध्ययन का प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।

कठोपनिषद् का उद्घोष — “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” — अर्थात् “उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो” — सक्रियता और ज्ञान-साधना का संदेश देता है। किन्तु यह जागरण केवल बाह्य उपलब्धियों का नहीं, बल्कि आत्मबोध और आंतरिक संतुलन का भी होना चाहिए।

3. विद्यालय : शिक्षा से आगे व्यक्तित्व की पाठशाला

विद्यालय केवल विषयगत ज्ञान प्रदान करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-निर्माण का आधार भी है। यहीं विद्यार्थी अनुशासन, सहकारिता, सामाजिकता और उत्तरदायित्व का प्रथम अनुभव प्राप्त करता है।

विद्यालय विद्यार्थियों को केवल यह नहीं सिखाता कि क्या सोचना चाहिए, बल्कि यह भी सिखाता है कि किस प्रकार सोचना चाहिए। प्रश्नाकुलता, तर्कशीलता और सामूहिक सहभागिता जैसे गुण विद्यालयीय वातावरण में विकसित होते हैं। अतः विद्यालय को केवल परीक्षा-केंद्रित संस्था मानना उसके व्यापक उद्देश्य को सीमित करना होगा।

4. कोचिंग संस्कृति : सहारा या अनिवार्यता?

वर्तमान समय में कोचिंग संस्कृति शिक्षा-जगत का एक प्रभावशाली आयाम बन चुकी है। प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं की बढ़ती संख्या तथा जटिलता ने विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन की ओर प्रेरित किया है। कोचिंग संस्थान विषयगत गहनता और परीक्षा-केंद्रित अभ्यास प्रदान करते हैं।

किन्तु एक प्रश्न निरंतर उभरता है—क्या कोचिंग शिक्षा का पूरक माध्यम बनी रहेगी, अथवा धीरे-धीरे उसकी अनिवार्यता में परिवर्तित हो जाएगी?

जब कोई सहायक व्यवस्था अनिवार्य स्वरूप धारण करने लगती है, तब वह विद्यार्थी के समय, मानसिक ऊर्जा और स्वतंत्र चिंतन को प्रभावित करने लगती है। शिक्षा का उद्देश्य यदि केवल परिणामों तक सीमित हो जाए, तो सीखने की स्वाभाविक जिज्ञासा भी प्रभावित हो सकती है।

“बाह्य मार्गदर्शन शिक्षा को दिशा दे सकता है, किन्तु ज्ञान की स्थायित्व-यात्रा अंततः व्यक्ति को स्वयं ही पूर्ण करनी होती है।”

5. स्वाध्याय : स्वयं से संवाद की प्रक्रिया

स्वाध्याय वह क्षेत्र है, जहाँ विद्यार्थी स्वयं अपने ज्ञान का निर्माता बनता है। यह केवल पाठों की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि आत्मसंवाद, चिंतन और आत्मविकास की प्रक्रिया है।

विद्यालय और कोचिंग से प्राप्त ज्ञान को स्थायित्व प्रदान करने का कार्य स्वाध्याय ही करता है। यदि शिक्षा बाह्य मार्गदर्शन से प्रारंभ होती है, तो उसकी वास्तविक परिपक्वता स्वाध्याय में दिखाई देती है। संतुलन की रस्सी पर स्थिरता बनाए रखने वाला नट जिस प्रकार अपने भीतर की एकाग्रता पर निर्भर करता है, उसी प्रकार विद्यार्थी भी स्वाध्याय के माध्यम से अपने भीतर की क्षमता से परिचित होता है।

ऐतरेय ब्राह्मण में प्रतिपादित “चरैवेति, चरैवेति” का उद्घोष सतत गति और ज्ञान-साधना का प्रतीक है।

अपेक्षाओं के बीच विद्यार्थी का मौन संघर्ष

कई बार विद्यार्थी के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष पाठ्यपुस्तकों में नहीं, बल्कि उन मौन अपेक्षाओं में छिपा होता है जो उसके चारों ओर उपस्थित रहती हैं। अच्छे अंक, श्रेष्ठ प्रदर्शन, प्रतियोगी सफलता और उज्ज्वल भविष्य की निरंतर आकांक्षाएँ कभी-कभी उसके भीतर एक अदृश्य दबाव निर्मित करने लगती हैं।

वह बाह्य रूप से सामान्य दिखाई दे सकता है, किन्तु उसके भीतर असफलता का भय, तुलना की चिंता और निरंतर आगे बढ़ने का दाब धीरे-धीरे स्थान ग्रहण कर सकता है।

विभिन्न शैक्षिक मनोविज्ञान अध्ययनों ने संकेत किया है कि निरंतर मानसिक दाब और अत्यधिक अध्ययन-भार अधिगम की गुणवत्ता तथा भावनात्मक संतुलन दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।

6. तकनीकी युग और शिक्षा का नया क्षितिज :

प्रौद्योगिकी-प्रधान युग ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन उपस्थित किए हैं। आभासी कक्षाएँ, ज्ञान-मंच तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शिक्षण-पद्धतियाँ शिक्षा को अधिक सुलभ और व्यापक बना रही हैं।

किन्तु प्रौद्योगिकी का उद्देश्य शिक्षा के मानवीय स्वरूप का प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि उसका परिष्कार होना चाहिए। ज्ञान का विस्तार यंत्रों द्वारा संभव हो सकता है, किन्तु संवेदना, विवेक और मानवीय मूल्यों का निर्माण अभी भी मनुष्य द्वारा ही संभव है।

7. संतुलन की खोज : समाधान की दिशाएँ

संतुलन किसी तैयार सूत्र से प्राप्त नहीं होता; वह समय-प्रबंधन, स्वाध्याय, विश्राम, सृजनात्मकता और संवाद के मध्य विकसित होने वाली जीवन-पद्धति है।

अध्ययन के साथ क्रीड़ा, साहित्य, कला और पारिवारिक संवाद के लिए समय निकालना भी उतना ही आवश्यक है जितना पाठ्यपुस्तकों के लिए समय देना, क्योंकि संतुलित जीवन ही संतुलित शिक्षा की आधारशिला बनता है।

8. उपसंहार : सफलता से आगे संतुलन का प्रश्न

तैत्तिरीयोपनिषद् का उपदेश — “सत्यं वद, धर्मं चर” — केवल नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन की संतुलित दिशा का भी संकेत देता है।

समकालीन विद्यार्थी वस्तुतः जीवन की संतुलन-रस्सी पर चलते उस नट की भूमिका का निर्वाह कर रहा है, जिसकी चुनौती केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं को स्थिर बनाए रखना भी है।

“आज का विद्यार्थी केवल पुस्तकों के पृष्ठ नहीं पलट रहा, वह जीवन की रस्सी पर संतुलन का एक मौन अभ्यास कर रहा है; क्योंकि शिक्षा की सर्वोच्च उपलब्धि शिखर तक पहुँचना नहीं, बल्कि शिखर पर पहुँचकर भी अपने भीतर के मनुष्य को जीवित रखना है।”

9. संदर्भ सूची

वैदिक एवं उपनिषदिक स्रोत

ऋग्वेद।

मंत्र: “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 1)।

संदर्भ विषय: उदार चिंतन, बहुदिशात्मक ज्ञान एवं शिक्षा-दृष्टि।

कठोपनिषद्।

उद्धरण: “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”।

संदर्भ विषय: ज्ञान-साधना, जागरण एवं आत्मविकास।

तैत्तिरीयोपनिषद्।

उद्धरण: “सत्यं वद, धर्मं चर”।

संदर्भ विषय: नैतिकता, जीवन-मूल्य एवं संतुलित आचरण।

ब्राह्मण ग्रंथ एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा

ऐतरेय ब्राह्मण।

उद्धरण: “चरैवेति, चरैवेति”।

संदर्भ विषय: सतत प्रगति, स्वाध्याय एवं ज्ञान-यात्रा।

दार्शनिक एवं शैक्षिक स्रोत

शिक्षा।

संदर्भ विषय: शिक्षा, व्यक्तित्व-विकास एवं मानवीय चेतना।

लोकतंत्र और शिक्षा।

संदर्भ विषय: शिक्षा, समाज एवं अनुभवात्मक अधिगम।

पीड़ितों की शिक्षाशास्त्र।

संदर्भ विषय: शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षा एवं चेतनात्मक विकास।

मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक शोध स्रोत

शैक्षिक मनोविज्ञान।

संदर्भ विषय: अधिगम प्रक्रिया, प्रेरणा एवं विद्यार्थी व्यवहार।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन।

संदर्भ विषय: मानसिक स्वास्थ्य, तनाव एवं अधिगम संबंधी अध्ययन।

समकालीन शैक्षिक नीति एवं विमर्श

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद।

संदर्भ विषय: विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा एवं अधिगम प्रक्रिया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020।

संदर्भ विषय: समग्र शिक्षा, कौशल विकास एवं बहुआयामी शिक्षण।

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