पहचान से पुनःप्रवेश तक : हर बच्चे की शिक्षा और भविष्य की साझा जिम्मेदारी
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(Educationist, DMIT Expert and Psychometric Counsellor)
विद्यालय की सुबह केवल पढ़ाई शुरू होने का समय नहीं होती। यह बच्चों के सपनों, जिज्ञासाओं और संभावनाओं के आकार लेने की शुरुआत भी होती है। लेकिन हर बच्चे को इस शुरुआत का अवसर नहीं मिल पाता। कुछ बच्चे कभी विद्यालय तक पहुँच ही नहीं पाते, कुछ परिस्थितियों के कारण बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी जरूरत के अनुरूप शैक्षिक सहयोग नहीं मिल पाता। वे विद्यालयों की उपस्थिति पंजि में न दिखाई दें, लेकिन वे शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी से बाहर नहीं हो जाते।
छत्तीसगढ़ में लगभग 51 लाख बच्चे विद्यालयों में नामांकित हैं। इसके बावजूद राज्य में लगभग 1 लाख 79 हजार बच्चे विद्यालयी शिक्षा से बाहर बताए जा रहे हैं। यह संख्या शिक्षा की पहुँच से जुड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करती है। इतने बड़े राज्य में इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का विद्यालय से दूर रहना केवल प्रशासनिक चिंता का विषय नहीं है; यह उन बच्चों के भविष्य और उनके परिवारों की आशाओं से भी जुड़ा प्रश्न है।
किसी बच्चे का पढ़ाई छूट जाना केवल एक विद्यार्थी का विद्यालय से दूर होना नहीं है। इसके साथ उसके सीखने, आत्मनिर्भर बनने और जीवन में बेहतर अवसर पाने की संभावनाएँ भी प्रभावित होती हैं। इसलिए शिक्षा की सफलता का आकलन केवल नामांकन, उपस्थिति और परीक्षा परिणामों से ही नहीं किया जा सकता। यह देखना भी उतना ही जरूरी है कि जो बच्चे शिक्षा से बाहर हैं, व्यवस्था उन तक पहुँचने के लिए क्या कर रही है।
समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़ द्वारा शुरू की गई ‘लइका चिन्हारी’ जैसी डिजिटल पहल इसी प्रश्न का एक महत्त्वपूर्ण उत्तर तलाशने का प्रयास है। इसका उद्देश्य शाला त्यागी, अप्रवेशी और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान तथा उनसे संबंधित जानकारी को व्यवस्थित करना है। इस पहल की वास्तविक उपयोगिता इस बात में निहित है कि इससे प्राप्त जानकारी बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के ठोस प्रयासों का आधार बन सके।
1. पहले बच्चे तक पहुँचना होगा :
किसी बच्चे के विद्यालय से बाहर होने के पीछे एक ही कारण नहीं होता। परिवार की आर्थिक स्थिति, आजीविका के लिए पलायन, विद्यालय की दूरी, घरेलू जिम्मेदारियाँ, सामाजिक परिस्थितियाँ और जागरूकता का अभाव, इनमें से कोई भी कारण उसकी पढ़ाई में बाधा बन सकता है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के सामने सुगम वातावरण, उपयुक्त शिक्षण सामग्री और व्यक्तिगत सहयोग की कमी जैसी चुनौतियाँ भी हो सकती हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे भौगोलिक और सामाजिक विविधता वाले राज्य में दूरस्थ बस्तियों तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करना विशेष ध्यान माँगता है। किसी बच्चे की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केवल विद्यालय के अभिलेख पर्याप्त नहीं होते। कई बार उसके घर, परिवार और आसपास के सामाजिक परिवेश की भी जानकारी आवश्यक है।
उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘लइका चिन्हारी’ जैसी डिजिटल पहल उपयोगी हो सकती है। डिजिटल माध्यम से बच्चों की जानकारी जुटाने और उसका सत्यापन करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित बन सकती है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि बच्चे शिक्षा से किन-किन कर्म से बाहर हैं और किन क्षेत्रों में विशेष प्रयासों की जरूरत है।
लेकिन एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि बच्चे का नाम दर्ज कर लेना, उसे शिक्षा से जोड़ देने के बराबर नहीं है। पहचान पहला कदम है; उसके बाद बच्चे की परिस्थिति को समझना और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना अगली जिम्मेदारी है।
पहचान तभी सार्थक है, जब वह किसी बच्चे तक सहायता पहुँचाने का रास्ता खोले।
2. आँकड़ों का अर्थ कार्रवाई से है :
शिक्षा प्रशासन में विश्वसनीय जानकारी का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है। कितने बच्चे विद्यालय से बाहर हैं, कहाँ उनकी संख्या अधिक है और किन परिस्थितियों में उन्हें सहायता की जरूरत है। इन प्रश्नों के उत्तर बेहतर योजना बनाने में मदद कर सकते हैं।
डिजिटल व्यवस्था का एक लाभ यह है कि जानकारी को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत संकलित और सत्यापित किया जा सकता है। इससे अलग-अलग स्तरों पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर आगे की कार्रवाई करना आसान हो सकता है। लेकिन आँकड़ों की गुणवत्ता केवल उनकी संख्या से तय नहीं होती। उनकी शुद्धता, अद्यतन स्थिति और वास्तविक परिस्थितियों से उनका मेल भी जरूरी है।
मान लीजिए किसी बस्ती में कई ऐसे बच्चों की पहचान हुई है जो विद्यालय नहीं जा रहे। अब यह जानना होगा कि उनमें से किसकी पढ़ाई आर्थिक कठिनाई के कारण रुकी है, कौन परिवार के साथ पलायन कर गया है और किसे विशेष शैक्षिक सहयोग की जरूरत है। इन सबके लिए एक जैसी कार्रवाई कारगर नहीं हो सकती।
इसलिए डिजिटल जानकारी को शिक्षक, विद्यालय, परिवार और स्थानीय समुदाय के प्रयासों से जोड़ना होगा। जानकारी तभी उपयोगी बनेगी, जब उसके आधार पर जिम्मेदारी तय हो, बच्चे से संपर्क किया जाए और उसकी समस्या के समाधान की दिशा में कदम उठाया जाए।
आँकड़ों की असली उपयोगिता किसी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि उस बदलाव में है जो वे किसी बच्चे के जीवन में ला सकें।
3. राष्ट्रीय शैक्षिक लक्ष्य और स्थानीय पहल :
विद्यालय से बाहर रह गए बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना देश की व्यापक शैक्षिक प्राथमिकताओं में शामिल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में ऐसे बच्चों की पहचान, उनकी शैक्षिक स्थिति पर ध्यान देने और उन्हें शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा ‘एनआईओएस मित्र’ पहल भी विद्यालय से बाहर रह गए बच्चों तक पहुँचने, उन्हें परामर्श देने, नामांकन में सहायता करने और आगे की पढ़ाई के लिए मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई है है।
छत्तीसगढ़ की ‘लइका चिन्हारी’ पहल को इसी व्यापक सोच के स्थानीय प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य में संकलित जानकारी का उपयोग जिलों, विकासखंडों और विद्यालयों के स्तर पर सीखने का अवसर, आवश्यक सहयोग और आगे बढ़ने के लिए निरंतर मार्गदर्शन कितनी प्रभावी ढंग से किया जाता है।
4. समान अवसर का अर्थ, अलग जरूरतों को समझना :
हर बच्चे की सीखने की गति, पारिवारिक परिस्थिति और शैक्षिक आवश्यकता अलग होती है। इसलिए सभी बच्चों के लिए एक जैसी व्यवस्था बना देना ही समानता नहीं है।
विशेष आवश्यकता वाले बच्चे को विद्यालय तक सुगम पहुँच, सहायक उपकरण, अनुकूल शिक्षण सामग्री और संवेदनशील व्यवहार की जरूरत हो सकती है। लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रहे बच्चे को अपनी कक्षा के स्तर तक पहुँचने के लिए अतिरिक्त शैक्षिक सहयोग देना पड़ सकता है। किसी बच्चे को परिवार के साथ संवाद और परामर्श की जरूरत हो सकती है।
ऐसे में बच्चे की पहचान के साथ उसकी आवश्यकता का आकलन भी जरूरी है। विद्यालय का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चा अपनी कठिनाई के कारण अलग थलग महसूस न करे, बल्कि उसे सीखने और सहभागिता का अवसर मिले।
समावेशी शिक्षा का आशय केवल सभी बच्चों को विद्यालय में स्थान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि विद्यालय और शिक्षण व्यवस्था बच्चों की विविध जरूरतों को स्वीकार करें और उनके अनुरूप सहयोग उपलब्ध कराएँ।
समान अवसर का अर्थ सबको एक जैसा देना नहीं, बल्कि हर बच्चे को आगे बढ़ने के लिए जरूरी सहारा देना है।
5. विद्यालय वापसी के बाद भी न टूटे पढ़ाई :
किसी बच्चे को विद्यालय तक वापस लाना निस्संदेह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन यह मंजिल नहीं, एक नई शुरुआत है। लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रहने के कारण बच्चे को पाठ्यक्रम समझने, सहपाठियों के साथ तालमेल बनाने और नियमित अध्ययन की आदत विकसित करने में कठिनाई हो सकती है।
ऐसे बच्चों के लिए विशेष शिक्षण सहयोग, नियमित संवाद और उनकी प्रगति पर ध्यान देना आवश्यक है। शिक्षक यदि बच्चे की पिछली शैक्षिक स्थिति को समझकर उसके अनुरूप सहायता दें, तो वह धीरे धीरे पढ़ाई की लय में लौट सकता है। परिवार का सहयोग और विद्यालय का संवेदनशील व्यवहार भी इस प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
इसलिए पहचान और नामांकन के बाद यह देखना जरूरी है कि बच्चा विद्यालय में नियमित है या नहीं, सीखने में उसकी प्रगति कैसी है और क्या उसे किसी अतिरिक्त सहायता की जरूरत है। यदि इन बातों पर लगातार ध्यान नहीं दिया गया, तो विद्यालय में वापसी के बाद भी उसके फिर से पढ़ाई छोड़ने की आशंका बनी रह सकती है।
6. तकनीक का साथ, मानवीय जिम्मेदारी का विकल्प नहीं :
डिजिटल तकनीक शिक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकती है। जानकारी का संकलन, सत्यापन और निगरानी बेहतर ढंग से हो सकती है। लेकिन तकनीक अपने आप किसी बच्चे की समस्या नहीं समझ सकती। उसके लिए संवेदनशील संवाद, स्थानीय परिस्थितियों की समझ और समय पर निर्णय जरूरी हैं।
बच्चों से जुड़ी जानकारी जुटाते समय उनकी निजता और गरिमा का ध्यान रखना भी अनिवार्य है। ऐसी जानकारी का उपयोग निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हो तथा उसकी सुरक्षा और अधिकृत पहुँच को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।
यह भी समझना होगा कि किसी बच्चे की पहचान केवल एक डिजिटल प्रविष्टि नहीं है। उसके पीछे एक परिवार, एक परिस्थिति और एक भविष्य जुड़ा है। तकनीक उस तक पहुँचने में मदद कर सकती है, लेकिन उसे शिक्षा से जोड़ने और उसकी पढ़ाई जारी रखने का काम शिक्षकों, परिवारों, समुदाय और प्रशासन के साझा प्रयासों से ही संभव होगा।
7. सफलता का पैमाना : बच्चे के जीवन में बदलाव :
‘लइका चिन्हारी’ जैसी पहल का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने बच्चों का विवरण दर्ज किया गया या कितनी जानकारी संकलित हुई। अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह हैं कि कितने बच्चों तक शिक्षा की पहुँच बनी, कितने बच्चे विद्यालय लौटे, कितने बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सहयोग मिला और कितने बच्चे नियमित रूप से अपनी पढ़ाई जारी रख सके।
इसके लिए पहचान से लेकर नामांकन और फिर सीखने की निरंतरता तक की प्रक्रिया पर ध्यान देना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि जिन बच्चों की पहचान हुई, उनके मामलों में आगे क्या कार्रवाई की गई। तभी डिजिटल व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता सामने आएगी।
शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक है, जब वह हर बच्चे तक पहुँचे। कोई बच्चा केवल इसलिए शिक्षा से वंचित न रह जाए कि उसकी परिस्थिति को समय रहते समझा नहीं गया या व्यवस्था उस तक पहुँच नहीं सकी।
‘लइका चिन्हारी’ की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण किसी आँकड़े या रिपोर्ट में नहीं, बल्कि उस बच्चे की बदली हुई दिनचर्या में दिखाई देगा जो फिर से विद्यालय जाने लगा है; उस परिवार के भरोसे में महसूस होगा जिसे अपने बच्चे के लिए शिक्षा का रास्ता दिखाई देने लगा है; और उस विद्यालय में नजर आएगा जहाँ हर बच्चे का स्वागत उसकी परिस्थिति को समझते हुए किया जाता है।
क्योंकि शिक्षा की असली उपलब्धि केवल यह नहीं कि कितने बच्चे विद्यालय पहुँचे, बल्कि यह भी है कि कोई बच्चा पीछे न छूटे।
7. संदर्भ सूची :
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020। नई दिल्ली : भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय।।
लइका चिन्हारी मोबाइल ऐप, समग्र शिक्षा, छत्तीसगढ़ 2026।राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान, भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय 2026।