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शिक्षा : परीक्षा से कक्षा तक: सीखने की कड़ी जोड़ने का समय

Abhyuday Bharat News / Mon, Nov 2, 2026 / Post views : 32

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छत्तीसगढ़ में प्रश्नपत्र निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण और मूल्यांकन के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

(Educationist, DMIT Expert and Psychometric Counsellor)

परीक्षा के परिणाम घोषित होते ही चर्चा अंकों, उत्तीर्णता और विद्यालयों के प्रदर्शन पर केंद्रित हो जाती है। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन परिणामों की इस चर्चा में एक बुनियादी सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है कि क्या विद्यार्थी वास्तव में वह सीख पा रहे हैं, जिसे सीखने की उनसे अपेक्षा की जाती है?

इस सवाल का जवाब केवल परीक्षा के अंकों में नहीं मिलता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि कक्षा में क्या पढ़ाया गया, विद्यार्थियों ने कितना अभ्यास किया, उनकी समझ को किस तरह परखा गया और परीक्षा से मिली जानकारी का आगे की पढ़ाई में कितना उपयोग हुआ।

यहीं स्कूली शिक्षा की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ एक दूसरे से जुड़ती हैं। पाठ्यक्रम, कक्षा शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण, प्रश्नपत्र निर्माण और मूल्यांकन को अलग अलग गतिविधियों की तरह चलाने से अपेक्षित सुधार सीमित रह सकता है। इनके बीच तालमेल हो, तभी परीक्षा सीखने की स्थिति समझने और शिक्षण को बेहतर बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा में सुधार की चर्चा के केंद्र में इस संबंध को रखना जरूरी है। सवाल केवल यह नहीं कि विद्यार्थी परीक्षा में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं; सवाल यह भी है कि उनकी सीखने की कठिनाइयों को पहचानने और दूर करने के लिए व्यवस्था क्या कर रही है।

1. प्रश्नपत्र कठिनाई नहीं, समझ परखे :

किसी प्रश्नपत्र की गुणवत्ता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह आसान है या कठिन। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके प्रश्न निर्धारित कक्षा के सीखने के लक्ष्यों के अनुरूप हैं या नहीं और वे विद्यार्थियों की समझ को कितनी विश्वसनीयता से परखते हैं।

यदि गणित में विद्यार्थियों को किसी नियम या विधि का अभ्यास कराया गया है, लेकिन परीक्षा में उसी अवधारणा को नई परिस्थिति में लागू करने को कहा जाता है, तो उनके प्रदर्शन को समझने के लिए एक अतिरिक्त सवाल पूछना होगा: क्या उन्हें इस तरह के प्रयोग का पर्याप्त अवसर मिला था?

इसी तरह, भाषा की परीक्षा में केवल पाठ याद कर लेना पर्याप्त नहीं है। पढ़कर अर्थ समझना, निष्कर्ष निकालना और अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करना भी सीखने का हिस्सा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि परीक्षा में केवल वही पूछा जाए जो कक्षा में हूबहू कराया गया हो। अच्छी परीक्षा विद्यार्थियों की समझ को नए संदर्भों में भी परख सकती है। लेकिन जिन क्षमताओं का आकलन किया जाना है, उन्हें विकसित करने के अवसर भी कक्षा में मिलने चाहिए।

इसीलिए प्रश्नपत्र तैयार करते समय पाठ्यक्रम, सीखने के परिणाम, प्रश्नों की भाषा और कठिनाई स्तर के बीच संतुलन जरूरी है। विषय विशेषज्ञों और अनुभवी शिक्षकों की समीक्षा से यह जाँचा जा सकता है कि प्रश्न अपेक्षित अधिगम को परखते हैं या अनावश्यक रूप से भाषा, अस्पष्टता अथवा अपरिचित प्रस्तुति के कारण कठिन बन जाते हैं।

प्रश्नपत्र का उद्देश्य विद्यार्थियों को चौंकाना नहीं, उनकी समझ को विश्वसनीय ढंग से परखना होना चाहिए।

2. सीखने के लक्ष्य कक्षा तक पहुँचें :

सीखने के परिणाम निर्धारित कर देना या उनसे संबंधित सामग्री उपलब्ध करा देना अपने आप में पर्याप्त नहीं है। उनका महत्व तभी है, जब वे कक्षा में पढ़ाने, अभ्यास कराने और विद्यार्थियों की प्रगति समझने के काम आएँ।

छत्तीसगढ़ में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) के माध्यम से प्रश्न बैंक और सीखने के परिणामों से संबंधित सामग्री उपलब्ध है। ये शिक्षकों के लिए उपयोगी आधार बन सकते हैं। लेकिन संसाधनों की उपलब्धता और उनका प्रभावी उपयोग अलग अलग बातें हैं। असली सवाल यह है कि इनका दैनिक शिक्षण में किस तरह इस्तेमाल हो रहा है।

गणित में किसी अवधारणा को समझने के लिए केवल हल किए हुए उदाहरण दिखा देना पर्याप्त नहीं होता। विद्यार्थियों को स्वयं सवाल हल करने, अपनी गलतियों को पहचानने और सीखी हुई विधि को दूसरी परिस्थिति में आजमाने का अवसर चाहिए। भाषा में भी पाठ पढ़ने के साथ उसका अर्थ समझना, प्रश्न पूछना और अपने शब्दों में उत्तर देना जरूरी है।

यदि परीक्षा में इन क्षमताओं को परखा जाना है, तो कक्षा में इनके विकास के अवसर भी मिलने चाहिए। इसके लिए हमेशा अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। पाठ पढ़ाने के बाद पूछे जाने वाले सवालों में बदलाव, विद्यार्थियों के उत्तरों पर चर्चा और उनकी गलतियों को समझकर दोबारा अभ्यास कराने जैसे कदम भी उपयोगी हो सकते हैं।

प्रश्नपत्र निर्माण और कक्षा शिक्षण के बीच संबंध यहीं स्पष्ट होता है। परीक्षा जिन क्षमताओं को महत्व देती है, पढ़ाई में भी उन क्षमताओं को विकसित करने की जगह होनी चाहिए।

3. परीक्षा के बाद असली काम शुरू होता है :

परीक्षा समाप्त होने और परिणाम घोषित होने के बाद शैक्षिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। वास्तव में, परिणामों का उपयोग किस तरह किया जाता है, इससे ही तय होता है कि परीक्षा अगली पढ़ाई को बेहतर बनाने में कितनी मददगार साबित होगी।

यदि किसी प्रश्न का उत्तर बहुत कम विद्यार्थी दे पाए, तो केवल यह दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं कि प्रश्न कठिन था। यह भी देखना होगा कि प्रश्न की भाषा स्पष्ट थी या नहीं, संबंधित अवधारणा का पर्याप्त अभ्यास हुआ था या नहीं और विद्यार्थियों ने प्रश्न में अपेक्षित बात को सही समझा या नहीं।

इसके लिए कुल अंकों और विषयवार औसत के साथ प्रश्नवार प्रदर्शन तथा उत्तर पुस्तिकाओं के नमूनों का विश्लेषण उपयोगी हो सकता है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि कठिनाई किसी खास अवधारणा में है, प्रश्न की बनावट में है, भाषा की समझ में है या सीखने के अवसरों में।

मान लीजिए, अनेक विद्यार्थी एक ही प्रकार के गणितीय सवाल में गलती कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में केवल उनके अंक दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना अधिक उपयोगी होगा कि गलती किस चरण पर हो रही है और उस अवधारणा को किस तरह दोबारा समझाया जाए।

ऐसा विश्लेषण किसी शिक्षक या विद्यालय को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि सुधार का रास्ता तय करने के लिए होना चाहिए। परिणामों से यदि यह पता चलता है कि विद्यार्थियों को किसी विषय में अतिरिक्त अभ्यास चाहिए, तो उस जरूरत के अनुरूप समय, सामग्री और सहयोग उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

परीक्षा का परिणाम तभी उपयोगी बनता है, जब उससे अगली पढ़ाई के लिए कोई ठोस दिशा निकलती है।

4. शिक्षक प्रशिक्षण का प्रमाण कक्षा में मिले :

शिक्षक प्रशिक्षण शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन प्रशिक्षण आयोजित होना, उपस्थिति दर्ज होना या निर्धारित सत्र पूरे हो जाना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि विद्यार्थियों के सीखने में सुधार आया है।

प्रशिक्षण की उपयोगिता इस बात से समझी जानी चाहिए कि शिक्षक ने उससे क्या सीखा और उस सीख का कक्षा में किस तरह इस्तेमाल किया। यदि परीक्षा में समझ, तर्क और सीखी हुई बातों के प्रयोग को महत्व दिया जा रहा है, तो प्रशिक्षण में भी ऐसे प्रश्न तैयार करने, विद्यार्थियों की गलतियों का विश्लेषण करने और अलग अलग सीखने की जरूरतों के अनुरूप सहायता देने का अभ्यास होना चाहिए।

इसके लिए वास्तविक प्रश्नपत्रों, विद्यार्थियों के उत्तरों और कक्षा की परिस्थितियों को प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जा सकता है। प्रशिक्षण के बाद शिक्षकों को अपने अनुभव साझा करने, नई विधियों को आजमाने और कठिनाइयों पर मार्गदर्शन पाने का अवसर भी मिलना चाहिए।

कक्षा अवलोकन, शिक्षक चर्चा और विद्यार्थियों के कार्यों की समीक्षा यह समझने में मदद कर सकती है कि प्रशिक्षण व्यवहार में कितना उपयोगी साबित हो रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल कमियाँ गिनाना नहीं, बल्कि शिक्षकों को सुधार के लिए सहयोग देना होना चाहिए।

प्रशिक्षण की सफलता का प्रमाण उसके आयोजन में नहीं, बल्कि कक्षा में दिखाई देने वाले बदलाव में मिलता है।

5. आँकड़े संकेत हैं, अंतिम फैसला नहीं :

छत्तीसगढ़ में सीखने की स्थिति को समझने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आकलनों से भी मदद मिल सकती है। NCERT के PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 की छत्तीसगढ़ राज्य रिपोर्ट में कक्षा 3 और कक्षा 6 के प्रदर्शन से जुड़े आँकड़े इस चर्चा के लिए एक उपयोगी संदर्भ देते हैं।

रिपोर्ट में दिए गए आँकड़ों के अनुसार, कक्षा 3 में भाषा के प्रश्नों पर छत्तीसगढ़ का औसत सही उत्तर प्रतिशत 59 था, जबकि राष्ट्रीय औसत 64 प्रतिशत था। गणित में राज्य का औसत 57 प्रतिशत और राष्ट्रीय औसत 60 प्रतिशत दर्ज किया गया।

कक्षा 6 में भाषा के लिए छत्तीसगढ़ का औसत 54 प्रतिशत, जबकि राष्ट्रीय औसत 57 प्रतिशत था। गणित में ये आँकड़े क्रमशः 42 और 46 प्रतिशत रहे। हमारे आसपास की दुनिया विषय में राज्य का औसत 47 प्रतिशत और राष्ट्रीय औसत 49 प्रतिशत दर्ज किया गया।

इन आँकड़ों की व्याख्या इस प्रकार से की जानी चाहिए कि ये सही उत्तरों के औसत प्रतिशत हैं, उत्तीर्णता दर नहीं। राज्य और राष्ट्रीय औसत के बीच अंतर सीखने की स्थिति पर विचार करने का आधार देता है, लेकिन अपने आप यह साबित नहीं करता कि इसके पीछे प्रश्नपत्र निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण या कक्षा शिक्षण में से कोई एक कारण है।

इसलिए जरूरी है कि व्यापक आँकड़ों के साथ विषयवार और प्रश्नवार कठिनाइयों को भी समझा जाए। विद्यार्थियों को किन अवधारणाओं में परेशानी हो रही है, उनकी गलतियों का स्वरूप क्या है और उन्हें किस तरह के अभ्यास तथा सहयोग की जरूरत है । इन सवालों के जवाब अधिक उपयोगी दिशा दे सकते हैं।

आँकड़ों का उद्देश्य केवल राज्यों या विद्यालयों की तुलना करना नहीं होना चाहिए। उनका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग यह पहचानना है कि सुधार की शुरुआत कहाँ से की जाए और आगे की प्रगति को किस तरह परखा जाए।

6. प्रश्नपत्र से कक्षा तक, जिम्मेदारी सबकी :

परीक्षा और शिक्षण के बीच बेहतर तालमेल किसी एक संस्था या व्यक्ति के प्रयास से नहीं बनेगा। प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों, SCERT, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों, विद्यालयों और शिक्षा प्रशासन के बीच नियमित संवाद जरूरी है।

प्रश्नपत्र बनाने वालों को कक्षा की वास्तविक परिस्थितियों और विद्यार्थियों की सीखने संबंधी कठिनाइयों की जानकारी मिलनी चाहिए। शिक्षकों को सीखने के लक्ष्यों के अनुरूप आकलन करने और परिणामों से मिली जानकारी का उपयोग करने में सहयोग मिलना चाहिए। प्रशिक्षण संस्थानों को भी सामने आ रही कठिनाइयों के अनुरूप प्रशिक्षण की विषयवस्तु और तरीकों पर काम करना चाहिए।

इसी तरह, विद्यालयों तक केवल परीक्षा परिणाम पहुँचा देना पर्याप्त नहीं है। परिणामों के आधार पर विद्यार्थियों को अतिरिक्त अभ्यास, दोबारा समझाने और अलग अलग जरूरतों के अनुरूप सहायता देने के लिए समय और संसाधन उपलब्ध होने चाहिए।

जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उसका अर्थ केवल कम परिणाम आने पर जिम्मेदारी तय करना नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी है कि कठिनाइयों की पहचान होने के बाद उन्हें दूर करने के लिए जरूरी सहयोग मिले। सुधार तभी टिकाऊ होगा, जब मूल्यांकन से मिली जानकारी निर्णयों और कक्षा की अगली गतिविधियों में दिखाई देगी।

7. सुधार का पैमाना: विद्यार्थी ने क्या सीखा?

शिक्षा में सुधार का मूल्यांकन केवल नई योजनाओं, आयोजित प्रशिक्षणों या घोषित परीक्षा परिणामों की संख्या से नहीं किया जा सकता। ये प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका वास्तविक महत्व इस बात में है कि वे विद्यार्थियों के सीखने में कितनी मदद करते हैं।

छत्तीसगढ़ में प्रश्नपत्र निर्माण, कक्षा शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण और मूल्यांकन के बीच संबंध को लगातार मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए प्रश्नपत्रों की समीक्षा, उत्तर पुस्तिकाओं का विश्लेषण, शिक्षकों के बीच अनुभवों का आदान प्रदान और सीखने में कठिनाई महसूस कर रहे विद्यार्थियों को समय पर सहायता जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

परीक्षा का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं है कि कौन आगे है और कौन पीछे। उसे यह समझने में भी मदद करनी चाहिए कि विद्यार्थी कहाँ तक पहुँचे हैं, उन्हें किन क्षेत्रों में कठिनाई है और आगे बढ़ने के लिए किस तरह के सहयोग की जरूरत है।

जब प्रश्नपत्र सीखने के लक्ष्यों के अनुरूप होंगे, शिक्षक प्रशिक्षण कक्षा की जरूरतों से जुड़ेगा और परीक्षा के परिणाम अगली पढ़ाई को दिशा देंगे, तभी मूल्यांकन अपनी पूरी उपयोगिता हासिल कर सकेगा।

परीक्षा का सबसे बड़ा मूल्य केवल परिणाम बताने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि आगे की पढ़ाई को बेहतर कैसे बनाया जाए।

8. संदर्भ सूची :

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, परख 2025।

परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2025 : छत्तीसगढ़ राज्य रिपोर्ट। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ।

प्रश्न बैंक एवं अधिगम संकेतक, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, छत्तीसगढ़।

अधिगम प्रतिफल एवं संदर्भ सामग्री, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, छत्तीसगढ़।

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