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बिहार :-पटना न्यूज : 16 दिनों में 10 मंदिरों में पूजा, क्या संघ को कोई संदेश दे रहे हैं सीएम सम्राट ?

Abhyuday Bharat News / Sat, May 2, 2026 / Post views : 303

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बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पिछले 16 दिनों में 10 मंदिरों का दौरा कर चर्चा में हैं। पदभार ग्रहण करने के बाद उनकी इस बढ़ी हुई धार्मिक सक्रियता और घर पर सत्यनारायण पूजा के आयोजन को लोग उनकी मनौतियों के पूरा होने और संघ को विशेष संदेश देने के तौर पर देख रहे हैं।

पटना: बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पद ग्रहण किए हुए करीब 16 दिन हुए हैं। इन 16 दिनों में उन्होंने करीब 10 मंदिरों में पूजा-अर्चना की। अपने घर पर भगवान सत्यनाराय़ण की पूजा भी रखी। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के लिए कई मनौतियां मांगी होंगी। जब मनोकामना पूरी हो गई तो अब मंदिर-मंदिर जाकर भगवान का आशीर्वाद ले रहे हैं। लेकिन इतनी पूजा? इसके पहले तो वे खास धार्मिक अवसरों पर ही पूजा करने मंदिर जाते थे। लेकिन, अब तो लगभग रोज ही किसी न किसी मंदिर में जाकर आराधना कर रहे हैं। ऐसा कर के क्या वे कुछ साबित करना चाहते हैं?


16 दिन में करीब 10 मंदिरों में पूजा

पहले एक नजर डालते हैं कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में कहां-कहां पूजा की।

  • 15 अप्रैल- मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले राजवंशी नगर स्थित पंचरूपी हनुमान मंदिर में पूजा

  • 18 अप्रैल- पूरे परिवार के साथ सोनपुर के बाबा हरिहरनाथ मंदिर में पूजा

  • 19 अप्रैल- देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर और दुमका के बाबा बासुकीनाथ मंदिर में पूजा

  • 25 अप्रैल – जानकी नवमी के अवसर पर सीतामढ़ी के पुनौरा धाम स्थित मां जानकी मंदिर में पूजा

  • 28 अप्रैल- पटना के प्राचीन बड़ी पटनदेवी मंदिर और छोटी पटन देवी मंदिर में पूजा

  • 1 मई- मुख्यमंत्री ने अपने आवास में भगवान सत्यनारायण की पूजा की।

  • 1 मई- पटना के बुद्ध स्मृति पार्क में भगवान बुद्ध की पूजा

  • 1 मई- गया के विष्णुपद मंदिर में पूजा और बोधगया के महाबोधि मंदिर में पूजा

  • 1 मई- नालंदा के सरमेरा स्थित श्री श्री 108 श्री शरण निवास बाबा महतो साहब मंदिर में पूजा

क्या संघ की शंका को दूर करने की कोशिश है?

क्यासम्राट चौधरीमुख्यमंत्री बनने की खुशी में इतनी पूजा कर रहे हैं? जानकारों का कहना है कि यह भी एक कारण हो सकता है लेकिन ऐसा कर के वे कुछ साबित भी करना चाहते हैं। जब उनके मुख्यमंत्री बनने की चर्चा चल रही थी उस समय भाजपा और संघ के कुछ नेताओं ने उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि पर सवाल उठाए थे। सम्राट चौधरी की राजनीतिक शुरुआत राजद से हुई थी। करीब 14 साल तक वे राजद में रहे। इसके बाद वे जदयू में गए और फिर भाजपा में आए। भाजपा में आए हुए उन्हें नौ साल ही हुए हैं। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर भाजपा और संघ में एक राय नहीं थी। बहुत मशक्कत के बाद उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए तय हुआ था।

क्या कट्टर भाजपा नेता की छवि बनाना चाहते हैं?

अब जबसम्राट चौधरी मुख्यमंत्रीबन गए हैं तो खुद को कट्टर भाजपा नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। जैसे संघ से निकले नेता सनातन संस्कृति के लिए समर्पित रहते हैं उसी तरह सम्राट चौधरी भी आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। वे भले संघ की शाखा में नहीं गए। लेकिन अब वे पूजा-अर्चना के जरिए संघ के नेताओं को अपनी निष्ठा का संदेश दे रहे हैं।


क्या वे बिहार के हिमंत बिस्वा सरमा बनेंगे?

दूसरे दल से आया नेता भी भाजपा का बड़ा और समर्पित नेता बन सकता है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। वे
कांग्रेस से भाजपा में आए थे। लेकिन आज की तारीख में वे हिंदुत्व का दूसरा सबसे बड़ा चेहरा हैं। योगी आदित्यनाथ के बाद हिमंत बिस्वा सरमा का ही नाम आता है। हिंदूवादी छवि ने हिमंत बिस्वा सरमा को असम का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बना दिया है। वे संघ प्रशिक्षित किसी भाजपा नेता से अधिक राष्ट्रवादी हैं। सम्राट चौधरी भी असम के मुख्यमंत्री की राह पर चलना चाहते हैं। मुख्यमंत्री तो बन गए हैं। लेकिन भाजपा में प्रतिष्ठित होने के लिए उन्हें खुद को एक समर्पित हिंदूवादी नेता के रूप में ढालना होगा। वो भी बिल्कुल ईमानदारी से। शायद अपनी नई छवि निर्माण के लिए ही वे लगातार पूजा-पाठ कर रहे हैं।

क्या पूजा-पाठ को राजनीति से जोड़ कर देखना सही है?

धार्मिक आयोजन भी जनता से जुड़ाव का एक बड़ा जरिया हैं। इससे जनता के मन में नेता के प्रति विश्वास बढ़ता है। सम्राट चौधरी भी ऐसा कर के जनता का विश्वास और समर्थन हासिल करना चाहते हैं। हालांकि कुछ जानकार इस व्याख्या को एकपक्षीय मान रहे हैं। उनका कहना है कि पूजा- अर्चना व्यक्तिगत आस्था और श्रद्धा का विषय है। इसे राजनीति से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। सम्राट चौधरी केवल पूजा-पाठ कर के ही लंबे समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह सकते हैं। उन्हें काम कर के दिखाना होगा। उन्हें उस लंबी लकीर को छूना है, जिसे नीतीश कुमार खींच कर दिल्ली गए हैं। यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इसके लिए उन्हें अथक मेहनत करनी होगी। हो सकता है कि इसी आत्मबल को पाने के लिए वे नियमित रूप से पूजा-पाठ कर रहे हों। वजह चाहे जो भी हो, फिलहाल मुख्यमंत्री की आध्यात्मिक सक्रियता अभी चर्चा का विषय है।

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