Tue, 16 Jun 2026
Logo

ब्रेकिंग

एक विषय, अनेक ब्लूप्रिंट: क्या हम प्रतिभा का चयन कर रहे हैं या परीक्षा-पद्धति का परीक्षण?

FIFA World Cup 2026 के छठे दिन खेले जाएंगे 5 मैच, मेसी और रोनाल्डो पर रहेंगी दुनिया की नजरें, यहां देखें पूरा शेड्यूल

Sushant Singh Rajput की मौत पर बनेगी फिल्म, Sorry Babu के फर्स्ट पोस्टर ने मचाई सनसनी

जम्मू-कश्मीर में LOC के पास लैंडमाइन ब्लास्ट, अफसर समेत सेना के 4 जवान घायल

ममता बनर्जी ने सीएम सुवेंदु की जीत को चैलेंज कियाः भवानीपुर सीट को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में खुद याचिका दायर की

दिल्ली की सॉफ्टवेयर इंजीनियर महिला की मसूरी में संदिग्ध मौत, कमरे में मिला शव; पुलिस जांच में जुटी

दिल्ली के सभी थानों में हर शनिवार होगी ‘थाना दिवस-जनसुनवाई’, राघव चड्ढा समेत सांसदों के मुद्दे पर संजय सिंह ने दिया जवाब

राम मंदिर चढ़ावा कांड में नया खुलासा: बैंक ने कंपनी को ठेका दिया, कर्मचारी ट्रस्ट ने तय किए

CM योगी आज करेंगे कानून व्यवस्था की समीक्षा बैठक, सभी डीएम-एसपी और कमिश्नर होंगे शामिल....

दिल्ली के बिजली उपभोक्ताओं को राहत, PPAC बढ़ोतरी का सब्सिडी वाले ग्राहकों पर सीमित असर

सूचना

शिक्षा : एक विषय, अनेक ब्लूप्रिंट: क्या हम प्रतिभा का चयन कर रहे हैं या परीक्षा-पद्धति का परीक्षण?

Abhyuday Bharat News / Tue, Jun 16, 2026 / Post views : 9

Share:
✍️ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ

जब विद्यालयी शिक्षा किसी विषय में दक्षता का प्रमाण दे चुकी है, तो उसी ज्ञान को अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सिद्ध करने की आवश्यकता क्यों?

किसी भी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता इस बात से नहीं आँकी जाती कि वह कितनी परीक्षाएँ लेती है, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह क्या मापती है।

1. क्या विद्यालय के बाद भी ज्ञान अधूरा माना जाता है? :

कल्पना कीजिए एक ऐसे विद्यार्थी की जिसने विद्यालय स्तर पर गणित में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। वह बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण करता है, उच्च शिक्षा की ओर बढ़ता है और फिर अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं का सामना करता है। हर परीक्षा में गणित वही रहता है, लेकिन उसका मूल्यांकन-ढांचा बदल जाता है - कहीं गति निर्णायक है, कहीं तर्क, कहीं विश्लेषण और कहीं परीक्षा-विशेष रणनीति।

यह स्थिति एक मूलभूत प्रश्न खड़ा करती है - क्या हर बार उसकी विषयगत दक्षता का परीक्षण हो रहा है, या विभिन्न परीक्षा-प्रणालियों के अनुरूप ढलने की क्षमता का?

यह प्रश्न केवल गणित का नहीं, बल्कि उन सभी विषयों का है जो विद्यालयी शिक्षा से लेकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं तक निरंतर बने रहते हैं।

2. एक ही ज्ञान, अनेक मूल्यांकन मानक :

गणित, विज्ञान, भाषा, सामाजिक विज्ञान और सामान्य अध्ययन जैसे विषय शिक्षा-व्यवस्था के हर स्तर पर समान रूप से उपस्थित रहते हैं। लेकिन उनके मूल्यांकन के मानक बदल जाते हैं।

कहीं स्मृति को महत्व दिया जाता है, कहीं विश्लेषणात्मक क्षमता को; कहीं वस्तुनिष्ठ प्रश्न निर्णायक होते हैं, तो कहीं वर्णनात्मक अभिव्यक्ति। परिणामस्वरूप विद्यार्थी को केवल विषय नहीं पढ़ना पड़ता, बल्कि हर परीक्षा का अलग “ब्लूप्रिंट” भी समझना पड़ता है।

यहीं एक गहरा प्रश्न उभरता है - क्या हम विषयगत ज्ञान का मूल्यांकन कर रहे हैं या परीक्षा-विशेष अनुकूलन क्षमता का?

जैसा कि आधुनिक शिक्षा-विमर्श में कहा जाता है - यदि परीक्षा केवल स्मृति को परखे, तो वह ज्ञान की नहीं, याददाश्त की प्रतियोगिता बन जाती है।

3. प्रतियोगी परीक्षाओं की आवश्यकता: एक आवश्यक संतुलन :

यह भी स्वीकार करना होगा कि प्रतियोगी परीक्षाओं का अस्तित्व एक व्यावहारिक आवश्यकता है। भारत सहित अधिकांश देशों में विद्यालयी मूल्यांकन मानकों में विविधता पाई जाती है, और अंक हमेशा समान क्षमता का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

इसके अतिरिक्त, प्रशासनिक सेवाओं, तकनीकी क्षेत्रों और शोध संस्थानों की आवश्यकताएँ भी भिन्न होती हैं - जहाँ निर्णय-क्षमता, विशिष्ट कौशल और विश्लेषणात्मक गहराई जैसे अलग-अलग गुणों की आवश्यकता होती है।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाएँ तुलनात्मक चयन की एक आवश्यक प्रणाली हैं। समस्या उनके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उनके अत्यधिक पुनरावृत्त स्वरूप में है।

4. पुनर्परीक्षण की सीमा कहाँ समाप्त होती है? :

चिंता तब उत्पन्न होती है जब प्रतियोगी परीक्षाएँ उस ज्ञान का बार-बार परीक्षण करने लगती हैं जिसे विद्यालयी शिक्षा पहले ही प्रमाणित कर चुकी होती है।

यदि किसी विषय में आधारभूत दक्षता पहले ही स्थापित हो चुकी है, तो परीक्षा प्रणाली को उस ज्ञान की पुनर्पुष्टि के बजाय उच्चतर क्षमताओं - जैसे विश्लेषण, अनुप्रयोग, निर्णय-निर्माण और नवाचार - पर केंद्रित होना चाहिए।

किन्तु व्यवहार में अनेक परीक्षाएँ उसी विषय-वस्तु को अलग-अलग प्रारूपों में पुनः प्रस्तुत करती हैं, जिससे मूल्यांकन का उद्देश्य अस्पष्ट हो जाता है।

5. जब तैयारी विषय की नहीं, पैटर्न की होने लगे :

आज की परीक्षा-व्यवस्था में एक स्पष्ट परिवर्तन देखा जा सकता है। अब तैयारी का केंद्र कई बार विषय की गहराई नहीं, बल्कि परीक्षा-पैटर्न की समझ बन गया है।

अभ्यर्थी यह जानने में अधिक समय लगाते हैं कि कौन-सी परीक्षा किस प्रकार के प्रश्न पूछती है, कहाँ गति निर्णायक है और कहाँ विश्लेषणात्मक लेखन। परिणामस्वरूप अधिगम का स्थान रणनीति ले लेता है।

यह प्रवृत्ति केवल शिक्षा को प्रभावित नहीं करती, बल्कि कोचिंग उद्योग के विस्तार और परीक्षा-निर्भर मानसिकता को भी बढ़ावा देती है।

6. क्या हम अपने ही प्रमाणन पर भरोसा करते हैं? :

यह प्रश्न शिक्षा-व्यवस्था की बुनियाद से जुड़ा है।

यदि विद्यालयी प्रमाणन विश्वसनीय है, तो प्रतियोगी परीक्षाओं को उससे आगे बढ़कर उच्चतर क्षमताओं का परीक्षण करना चाहिए। और यदि वह पर्याप्त विश्वसनीय नहीं है, तो सुधार का केंद्र विद्यालयी मूल्यांकन होना चाहिए - न कि एक ही विषय की अनंत पुनर्परीक्षा।

OECD और UNESCO जैसे वैश्विक शिक्षा विमर्शों में भी अब “योग्यता-आधारित शिक्षा” पर जोर दिया जा रहा है, जहाँ परीक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी नहीं, बल्कि उसका व्यावहारिक उपयोग मापना होता है।

7. ज्ञान से आगे: क्षमता की परीक्षा

इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था में केवल तथ्यात्मक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। आलोचनात्मक चिंतन, समस्या-समाधान, नवाचार, संचार-कौशल और निर्णय-क्षमता जैसी दक्षताएँ अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी हैं।

इसलिए आवश्यकता है कि प्रतियोगी परीक्षाएँ विषय-केंद्रित पुनर्परीक्षण से आगे बढ़कर दक्षता-आधारित मूल्यांकन की दिशा में विकसित हों। आधारभूत ज्ञान को विद्यालयी उपलब्धि के रूप में स्वीकार करते हुए चयन-प्रक्रियाएँ उन क्षमताओं पर केंद्रित होनी चाहिए जिनकी वास्तविक आवश्यकता समाज और संस्थानों को है।

8. निष्कर्ष: परीक्षा का भविष्य - पुनर्परीक्षण से प्रतिभा-पहचान तक

प्रतियोगी परीक्षाओं का उद्देश्य ज्ञान को बार-बार प्रमाणित करना नहीं, बल्कि उपयुक्त प्रतिभा की पहचान करना है। इसलिए मूल प्रश्न यह नहीं है कि परीक्षाएँ क्यों हैं, बल्कि यह है कि वे वास्तव में क्या माप रही हैं।

जब एक विद्यार्थी किसी विषय में अपनी दक्षता पहले ही सिद्ध कर चुका है, तब मूल्यांकन का उद्देश्य उसकी पुनर्पुष्टि नहीं, बल्कि उसके अनुप्रयोग और उच्चतर क्षमता की पहचान होना चाहिए।

शिक्षा में विश्वास, मूल्यांकन में स्पष्टता और चयन में निष्पक्षता तभी स्थापित होगी जब परीक्षा-प्रणालियाँ पुनर्परीक्षण की संस्कृति से आगे बढ़कर वास्तविक क्षमता-आधारित मूल्यांकन को अपनाएँ।

अंततः - शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जित करना है, पर यदि सफलता का निर्धारण ब्लूप्रिंट की समझ से होने लगे, तो विद्यार्थी विषय नहीं, ब्लूप्रिंट पास कर रहा होता है।

9. संदर्भ सूची

अंतरराष्ट्रीय शिक्षा एवं मूल्यांकन ढाँचा

यूनेस्को (2023). सीखने के परिणामों में सुधार हेतु मूल्यांकन प्रणाली. यूनेस्को शिक्षा क्षेत्र रिपोर्ट।

OECD (2023). एजुकेशन एट ए ग्लांस 2023

OECD (2023). जटिल कौशलों के मूल्यांकन के लिए नवाचार

OECD (2026). उच्च माध्यमिक प्रमाणन की सिद्धांत और व्यवहार

भारत की शिक्षा नीति एवं मूल्यांकन सुधार

शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार (2020). राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020).

PARAKH (2023). क्षमता-आधारित मूल्यांकन की रूपरेखा

CBSE (2021). कक्षा 6–10 हेतु क्षमता-आधारित शिक्षा एवं मूल्यांकन ढाँचा. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, नई दिल्ली।

शोध एवं शैक्षणिक अध्ययन

UNESCO MGIEP (2022). 21वीं सदी के लिए शिक्षा का पुनर्कल्पन

ACER (2022). क्षमता-आधारित मूल्यांकन: सिद्धांत और व्यवहा

Tags :

#CG NEWS

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

जरूरी खबरें

विज्ञापन

Advertisement
Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

विज्ञापन

Advertisement

Related Posts