शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, खेल, संस्कृति, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सामाजिक सुरक्षा को जोड़कर विद्यार्थी के लिए एक संवेदनशील सहयोग तंत्र बनाने की जरूरत
✍️ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )
बच्चा केवल विद्यार्थी नहीं है
विद्यालय में किसी बच्चे को पहली बार देखते ही हम अक्सर उसके बारे में कुछ तय कर लेते हैं; यह पढ़ाई में अच्छा है, यह कमजोर है, यह बहुत चंचल है, यह शांत है, इसकी उपस्थिति कम है, इसे गणित नहीं आती।
लेकिन क्या हम सचमुच उस बच्चे को जानते हैं?
कक्षा में सबसे पीछे बैठा बच्चा हो सकता है कि घर की किसी जिम्मेदारी से परेशान होकर आया हो। लगातार अनुपस्थित रहने वाला बच्चा शायद पढ़ाई से दूर नहीं जाना चाहता, बल्कि ऐसी परिस्थिति में हो जहाँ विद्यालय तक पहुँचना ही कठिन हो। परीक्षा में कम अंक पाने वाला विद्यार्थी संभव है कि किसी विषय में कमजोर हो, लेकिन किसी दूसरे क्षेत्र में उसकी असाधारण क्षमता हो।
बच्चा केवल अपनी उत्तर पुस्तिका लेकर विद्यालय नहीं आता। वह अपने साथ अपना घर, स्वास्थ्य, भावनाएँ, अनुभव, जिज्ञासाएँ, डर, सपने और संभावनाएँ भी लेकर आता है।
इसलिए शिक्षा का प्रश्न केवल इतना नहीं है कि बच्चे ने कितना सीखा? एक बड़ा प्रश्न यह भी है सीखने की इस यात्रा में बच्चा कितना विकसित हुआ?
यहीं से हमें विद्यार्थी को देखने की अपनी आदत बदलने की जरूरत महसूस होती है।
1. जब बच्चा एक है, तो व्यवस्था इतनी बिखरी क्यों है? :
हमारे देश में बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और योजनाओं की कमी नहीं है।
विद्यालय शिक्षा का काम करता है। स्वास्थ्य विभाग स्वास्थ्य की चिंता करता है। पोषण से जुड़ी व्यवस्थाएँ अपना काम करती हैं। खेल और युवा गतिविधियों के लिए अलग संस्थाएँ हैं। कौशल विकास, संस्कृति, सामाजिक सुरक्षा और बाल संरक्षण के लिए भी अलग अलग तंत्र हैं।
इन सभी के अपने महत्व और विशेषज्ञता हैं। फिर भी एक सवाल बार बार सामने आता है, क्या इन सबकी कोशिशें बच्चे तक एक साथ पहुँच रही हैं?
अक्सर ऐसा होता है कि एक विभाग अपनी गतिविधि पूरी कर देता है, दूसरा अपनी योजना लागू कर देता है और तीसरा अपनी रिपोर्ट तैयार कर देता है। कागज पर सब कुछ चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन बच्चे के जीवन में उसका संयुक्त प्रभाव कितना पड़ा, यह प्रश्न पीछे छूट जाता है।
यही वह जगह है जहाँ समन्वय केवल एक प्रशासनिक शब्द नहीं रह जाता।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा को अधिक समग्र, बहुविषयी और विद्यार्थी केंद्रित बनाने तथा संस्थाओं के बीच बेहतर एकीकरण और समन्वय की आवश्यकता पर बल देती है। इसका मूल भाव यही है कि विद्यार्थी के विकास को अलग अलग खानों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता।
विभाग अलग हो सकते हैं, लेकिन बच्चे की जरूरतें विभागों की सीमाएँ नहीं जानतीं। हमें इसलिए यह पूछने की जरूरत है। हमने क्या किया? से आगे बढ़कर बच्चे के लिए क्या बदला?
2. कम अंक या कोई अनदेखी जरूरत? :
एक विद्यार्थी लगातार गणित में कम अंक ला रहा है।हमारे पास उसके लिए एक आसान निष्कर्ष होता है, गणित में कमजोर है।
लेकिन एक शिक्षक यदि थोड़ा रुककर पूछे तो कई दूसरे प्रश्न सामने आ सकते हैं।
क्या उसकी बुनियादी संख्यात्मक समझ स्पष्ट है?
क्या भाषा की कठिनाई गणित समझने में बाधा बन रही है?
क्या वह नियमित विद्यालय आ रहा है?
क्या उसे बोर्ड ठीक से दिखाई देता है?
क्या वह ठीक से सुन पाता है?
क्या घर की परिस्थितियाँ उसके अध्ययन को प्रभावित कर रही हैं?
क्या वह किसी दूसरे क्षेत्र में बहुत अच्छा है?
क्या वह परीक्षा को लेकर अत्यधिक दबाव में है?
इन सवालों के बाद कमजोर विद्यार्थी की तस्वीर बदल सकती है।
कभी कभी कम अंक क्षमता की कमी नहीं, किसी अनदेखी जरूरत का संकेत होते हैं। हर कम अंक के पीछे कम क्षमता नहीं होती; कभी कभी उसके पीछे ऐसी कहानी होती है जिसे हमने सुना ही नहीं।
यदि विद्यालय, स्वास्थ्यकर्मी, परामर्शदाता, परिवार और संबंधित विशेषज्ञ समय पर एक दूसरे से जुड़ें, तो विद्यार्थी को केवल कमजोर कहकर छोड़ने के बजाय उसके लिए उचित सहायता की व्यवस्था की जा सकती है।
यहीं समन्वय का अर्थ दिखाई देता है।
3. स्वास्थ्य और मन: सीखने की अनदेखी बुनियाद
हम अक्सर कहते हैं कि बच्चा पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता।
लेकिन क्या हमने कभी यह देखा कि उसे दिखाई कितना देता है? वह सुन कितना पाता है? उसका स्वास्थ्य कैसा है? उसका पोषण कैसा है? वह पर्याप्त नींद ले रहा है या नहीं?
एक बच्चा यदि कक्षा के बोर्ड को ठीक से नहीं देख पाता और फिर भी उसे ध्यान नहीं देने वाला कहा जाता है, तो समस्या केवल बच्चे में नहीं है।
इसी तरह किसी विद्यार्थी की लगातार अनुपस्थिति को केवल अनुशासन की समस्या मान लेना भी अधूरा दृष्टिकोण है। उसके पीछे बीमारी, आर्थिक कठिनाई, दूरी, पारिवारिक जिम्मेदारी या कोई अन्य कारण हो सकता है।
इसलिए शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच संबंध केवल स्वास्थ्य जाँच शिविर तक सीमित नहीं होना चाहिए।
जरूरत है एक ऐसी व्यवस्था की जिसमें समस्या की पहचान हो, सही व्यक्ति या संस्था तक बात पहुँचे, सहायता मिले और फिर यह भी देखा जाए कि स्थिति बदली या नहीं।
पहचान → सहायता → अनुश्रवण
इतना सरल दिखने वाला क्रम किसी बच्चे के लिए बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है। बच्चे के स्वास्थ्य को समझे बिना उसके सीखने को समझना अधूरा है।
आज वैश्विक शिक्षा विमर्श भी स्वास्थ्य एवं कल्याण को शिक्षा से अलग विषय मानने के बजाय उसके अभिन्न हिस्से के रूप में देखने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
4. हर बच्चे में एक संभावना है :
हम बच्चों को अक्सर उनके अंकों से पहचानते हैं।
लेकिन कोई बच्चा गणित में सामान्य होते हुए भी किसी मशीन को खोलकर समझ सकता है। कोई विज्ञान की किताब में औसत हो सकता है, लेकिन खेत की मिट्टी, मौसम या स्थानीय जैव विविधता के बारे में अद्भुत समझ रख सकता है। किसी बच्चे की आवाज में संगीत हो सकता है, किसी के खेल में नेतृत्व, किसी के हाथों में शिल्प, तो किसी में लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता।
यदि हम केवल परीक्षा की दृष्टि से देखेंगे, तो इन संभावनाओं का बड़ा हिस्सा दिखाई ही नहीं देगा। यही कारण है कि कौशल, व्यावसायिक शिक्षा, कला, खेल और कैरियर मार्गदर्शन को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ना जरूरी है।
बच्चे को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि तुम्हें आगे क्या करना है। उसे पहले यह समझने में मदद करनी होगी
तुम्हें क्या अच्छा लगता है?
तुम किस काम में सहज हो?
तुम्हारी ताकत क्या है?
तुम्हें किस तरह के अवसर चाहिए?
हर बच्चे को एक ही साँचे में ढालना शिक्षा नहीं; उसकी अपनी संभावना को पहचानकर उसे अवसर देना शिक्षा है।
5. कक्षा की दीवारों के बाहर भी सीखना जारी रहता है :
कई बार विद्यालय में खेल का समय आते ही हम उसे पढ़ाई से अलग समझ लेते हैं। कला को भी अतिरिक्त गतिविधि कह दिया जाता है। संगीत, नाटक, स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक कार्य अक्सर मुख्य शिक्षा के बाहर चले जाते हैं।
लेकिन मैदान में बच्चा केवल दौड़ना नहीं सीखता। वह हार स्वीकार करना, फिर कोशिश करना, नियम मानना और टीम के साथ चलना भी सीखता है।
नाटक केवल अभिनय नहीं सिखाता। वह दूसरे व्यक्ति की स्थिति को समझना सिखाता है। लोककला केवल संस्कृति का प्रदर्शन नहीं है। वह बच्चे को अपनी जड़ों से जोड़ती है।
किसी समुदाय के साथ किया गया काम केवल गतिविधि नहीं जिम्मेदारी और नागरिकता का अनुभव हो सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी कला, विज्ञान, व्यावसायिक शिक्षा और अन्य क्षेत्रों के बीच कठोर विभाजनों को कम करते हुए विद्यार्थियों को व्यापक अधिगम अनुभव देने की दिशा में आगे बढ़ती है।
कक्षा ज्ञान देती है; जीवन उसके अर्थ समझाता है। इसलिए विद्यालय की दीवारें सीखने की सीमा नहीं होनी चाहिए।
6. बच्चे को सुनना भी शिक्षा है :
हर समस्या किताब में दिखाई नहीं देती।
कभी बच्चा पढ़ाई में पीछे नहीं होता, वह भीतर से परेशान होता है। कभी वह सवाल पूछना बंद कर देता है। कभी वह दोस्तों से कटने लगता है। कभी उसका व्यवहार अचानक बदल जाता है।
ऐसे संकेतों को केवल अनुशासन का प्रश्न मानना उचित नहीं। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि विद्यालय में कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे वह बिना डर बात कर सकता है।
यहीं मनोवैज्ञानिक परामर्श, कैरियर मार्गदर्शन एवं सामाजिक भावनात्मक अधिगम की भूमिका आती है।
परामर्श केवल उस विद्यार्थी के लिए नहीं होनी चाहिए जिसे समस्या वाला माना गया है। आत्म समझ, भावनाओं को संभालना, निर्णय लेना, असफलता से सीखना और भविष्य की दिशा चुनना, ये सभी क्षमताएँ हर बच्चे के जीवन में उपयोगी हैं।
राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र के हालिया समग्र प्रगति पत्र संबंधी विमर्श में विद्यार्थी की प्रगति को केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न रखते हुए सामाजिक भावनात्मक विकास, आत्म चिंतन, सहानुभूति, सहयोग, सृजनात्मकता और जीवन मूल्यों को भी मूल्यांकन का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।
जिस बच्चे को सुना जाता है, उसे अपनी बात कहने का ही नहीं, अपने रास्ते खोजने का साहस भी मिलता है।विद्यालय में परामर्श को संकट के बाद की सेवा के बजाय विकास का नियमित सहयोग बनाने की जरूरत है।
7. कोई बच्चा व्यवस्था से बाहर नहीं :
समग्र विकास की चर्चा तब अधूरी रह जाती है जब हम उन बच्चों को भूल जाते हैं जिनके लिए विद्यालय तक पहुँचना ही एक संघर्ष है।
किसी परिवार की आर्थिक कठिनाई, सामाजिक परिस्थिति, दिव्यांगता, पारिवारिक संकट या बाल सुरक्षा से जुड़ी समस्या बच्चे की शिक्षा को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे मामलों में विद्यालय अकेला सब कुछ नहीं कर सकता उसे सामाजिक सुरक्षा, बाल संरक्षण, स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन से जुड़ना होगा।
यदि कोई बच्चा लगातार विद्यालय नहीं आ रहा, तो केवल यह पूछना ही पर्याप्त नहीं वह क्यों नहीं आया? कभी कभी हमें यह भी पूछना चाहिए कि हम उसके घर तक क्यों नहीं पहुँचे?
समावेश का अर्थ केवल दरवाजा खुला रखना नहीं; जरूरत पड़ने पर बच्चे तक स्वयं पहुँचना भी है।
8. समन्वय का अर्थ बैठक नहीं, साझा कार्रवाई है :
अंतर विभागीय बैठकें जरूरी हैं। लेकिन केवल बैठकें काफी नहीं। किसी विद्यार्थी की समस्या सामने आने के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि
किसे सूचना देनी है?
कौन कार्रवाई करेगा?
कब तक करेगा?
किस संस्था की मदद चाहिए?
और कुछ समय बाद यह कैसे पता चलेगा कि समस्या कम हुई या नहीं? यही वह अंतर है जो समन्वय को कागज से जमीन तक ले जाता है।
समन्वय तब सार्थक होता है, जब बैठक खत्म होने के बाद किसी बच्चे के जीवन में कुछ बदलना शुरू हो। इसलिए असली लक्ष्य अधिक बैठकें नहीं, बच्चे की समस्या और समाधान के बीच की दूरी कम होनी चाहिए ।
9. रिपोर्ट कार्ड से आगे, विद्यार्थी तक :
हमारे लिए परीक्षा और अंक महत्वपूर्ण हैं। वे सीखने की कुछ तस्वीर देते हैं। लेकिन क्या वे पूरी तस्वीर हैं?
एक बच्चा परीक्षा में अच्छा कर सकता है और फिर भी सहयोग करना, अपनी भावनाओं को संभालना या निर्णय लेना सीखने की जरूरत रख सकता है।
दूसरा बच्चा अकादमिक रूप से औसत हो सकता है, लेकिन उसमें रचनात्मकता, नेतृत्व या किसी कौशल की असाधारण क्षमता हो सकती है।
इसीलिए आकलन को केवल अंक और ग्रेड तक सीमित रखने के बजाय विद्यार्थी की व्यापक प्रगति को समझने की दिशा में बढ़ना जरूरी है।
राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र का समग्र प्रगति पत्र इसी व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है। इसमें विद्यार्थी के संज्ञानात्मक और शैक्षणिक विकास के साथ उसके सामाजिक भावनात्मक, शारीरिक, सृजनात्मक, नैतिक तथा सांस्कृतिक विकास के विभिन्न आयामों को समझने और उनका समग्र आकलन करने पर जोर दिया गया है।
यह केवल प्रगति पत्र बदलने की बात नहीं है। यह बच्चे को देखने की हमारी दृष्टि बदलने की बात है। अच्छा रिपोर्ट कार्ड वह नहीं जो बच्चे के बारे में सबसे ज्यादा लिखे; अच्छा रिपोर्ट कार्ड वह है जो शिक्षक को बच्चे को बेहतर समझने में मदद करे।
और शायद आकलन का सबसे उपयोगी प्रश्न यही होना चाहिए कि इस बच्चे के लिए अब अगला सही कदम क्या है?
10. डेटा से निदान, निदान से हस्तक्षेप :
आज हमारे पास पहले से कहीं अधिक डेटा है; उपस्थिति, उपलब्धि, मूल्यांकन, स्वास्थ्य, गतिविधियों और अनेक कार्यक्रमों से जुड़ी सूचनाएँ।
लेकिन डेटा तभी उपयोगी है जब वह निर्णय में बदले। यदि किसी बच्चे की उपस्थिति लगातार कम है, तो कारण खोजा जाए।
यदि सीखने का स्तर अपेक्षा से कम है, तो अधिगम अंतराल पहचाना जाए। यदि किसी विद्यार्थी में खेल, कला या कौशल की विशेष क्षमता दिखाई देती है, तो उसे अवसर मिले। यदि कोई विद्यार्थी भावनात्मक सहयोग चाहता है, तो सही सहायता तक पहुँच बने।
अर्थात
डेटा → समझ → कार्रवाई → अनुश्रवण → सुधार
लेकिन इसके साथ एक सावधानी भी जरूरी है। बच्चे का डेटा उसकी मदद के लिए हो, उसे किसी स्थायी लेबल में बदलने के लिए नहीं।
गोपनीयता, बाल सुरक्षा और डेटा सुरक्षा किसी भी डिजिटल विद्यार्थी सहयोग व्यवस्था की बुनियाद होनी चाहिए।
11. शिक्षक अकेला नहीं, पूरा तंत्र उसके साथ :
हम अक्सर शिक्षक से बहुत कुछ करने की अपेक्षा करते हैं।
आज शिक्षक से अपेक्षा केवल पढ़ाने की नहीं रह गई है। उसे अध्यापक के साथ परामर्शदाता और कैरियर मार्गदर्शक भी बनना है; विद्यार्थियों की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को समझना है, खेल कूद की जिम्मेदारी संभालनी है, अभिभावकों से निरंतर संवाद रखना है और विद्यालय के बाहर उभरती सामाजिक चुनौतियों के समाधान में भी भूमिका निभानी है।
यह अपेक्षा व्यावहारिक नहीं है।
शिक्षक को हर समस्या का विशेषज्ञ बनाने के बजाय उसके चारों ओर विशेषज्ञता का नेटवर्क बनाना अधिक उचित होगा।
शिक्षक इतना जानता हो कि किस समस्या की पहचान कैसे करनी है और जरूरत पड़ने पर किस व्यक्ति या संस्था से सहयोग लेना है।
वह विद्यार्थी और सहायता तंत्र के बीच एक सक्षम सेतु बन सकता है। शिक्षक को हर समस्या का समाधानकर्ता नहीं, समाधान तक पहुँच बनाने वाला सक्षम सेतु बनाना होगा।
जब पूरा तंत्र शिक्षक के साथ खड़ा होता है, तब शिक्षक भी बच्चे के साथ अधिक मजबूती से खड़ा हो पाता है।
12. विद्यालय से समुदाय तक: सीखने का पूरा परिवेश :
बच्चे का विकास केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय और समुदाय तीनों की साझेदारी के बिना शिक्षा अधूरी है।
किसी गाँव का स्थानीय कलाकार बच्चों को अपनी कला सिखा सकता है। कोई किसान खेती और मौसम का स्थानीय ज्ञान साझा कर सकता है। कोई चिकित्सक स्वास्थ्य के बारे में बात कर सकता है। उच्च शिक्षा संस्थान विज्ञान और तकनीक के अनुभव दे सकते हैं। स्थानीय उद्योग बच्चों को काम की दुनिया से परिचित करा सकते हैं।
ऐसी साझेदारियाँ विद्यालय को केवल पढ़ाने की जगह नहीं रहने देतीं; वह उसे समुदाय के सीखने का केंद्र बना सकती हैं। और तब विद्यार्थी केवल किताब से नहीं, अपने आसपास की दुनिया से भी सीखता है।
13. अब जरूरत नई योजनाओं की नहीं, नए जोड़ की है :
भारत में योजनाएँ हैं। संस्थाएँ हैं। विशेषज्ञ हैं। संसाधन हैं। अगली चुनौती शायद यह नहीं कि हम एक और योजना शुरू करें।
चुनौती यह है कि जो कुछ पहले से है, उसे बच्चे की जरूरत के आसपास कैसे जोड़ा जाए। एक विद्यार्थी को स्वास्थ्य सहायता चाहिए तो विद्यालय को पता हो कि कहाँ जाना है।
यदि किसी बच्चे को परामर्श की आवश्यकता हो, तो रेफरल के बाद नियमित अनुवर्तन भी सुनिश्चित किया जाए। किसी में कौशल की संभावना है तो उसे अवसर मिले। किसी की अनुपस्थिति बढ़ रही है तो कारण तक पहुँचा जाए।
और यदि कोई बच्चा पीछे छूट रहा है, तो व्यवस्था तब तक चैन से न बैठे जब तक यह समझ न ले कि उसे किस तरह का सहयोग चाहिए।
यही वास्तविक अभिसरण है।
14. समन्वय को जमीन पर उतारने के पाँच सूत्र :
पहला : बच्चे से शुरुआत हो
किसी योजना की शुरुआत यह सोचकर न हो कि हमारा विभाग क्या करेगा, बल्कि यह पूछकर हो कि बच्चे को किस मदद की जरूरत है?
दूसरा : साझा जिम्मेदारी स्पष्ट हो
किसी समस्या में कौन क्या करेगा, यह स्पष्ट हो। जिम्मेदारी अस्पष्ट होगी तो समन्वय भी अस्पष्ट रहेगा।
तीसरा : संदर्भण के बाद कहानी खत्म न हो
किसी विद्यार्थी को दूसरे विभाग या विशेषज्ञ के पास भेज देना समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि उसे सहायता मिली या नहीं और उससे क्या फर्क पड़ा।
चौथा : शिक्षक को अकेला न छोड़ें
शिक्षक को प्रशिक्षण के साथ समय, संसाधन और विशेषज्ञ सहयोग भी चाहिए।
पाँचवाँ : अंतिम परिणाम बच्चे के जीवन में दिखाई दे
कितनी बैठकें हुईं और कितने कार्यक्रम आयोजित हुए ये जरूरी सूचनाएँ हैं, लेकिन अंतिम कसौटी नहीं अंतिम कसौटी है। बच्चे के सीखने, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आत्मविश्वास, कौशल या भविष्य की दिशा में क्या बेहतर हुआ?
15. अंतिम कसौटी: बच्चे के जीवन में क्या बदला?
किसी शिक्षा व्यवस्था की सफलता को केवल बैठकों, प्रशिक्षणों, योजनाओं और रिपोर्टों से नहीं मापा जा सकता। हमें कुछ सरल सवालों पर लौटना होगा।
क्या बच्चा बेहतर सीख रहा है?
क्या वह स्वस्थ है?
क्या वह विद्यालय में सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है?क्या उसकी प्रतिभा दिखाई दे रही है?
क्या उसे अपनी भावनाओं और कठिनाइयों के बारे में बात करने की जगह मिल रही है?
क्या उसे अपने भविष्य की दिशा चुनने में सहायता मिल रही है?
क्या वह अपने परिवार, समुदाय और समाज के प्रति जिम्मेदारी समझ रहा है?
यदि इन सवालों के जवाब धीरे धीरे हाँ की ओर बढ़ रहे हैं, तभी हम कह सकते हैं कि हमारी योजनाएँ और संस्थाएँ सही दिशा में काम कर रही हैं।
क्योंकि अंततः हमने कितनी योजनाएँ चलाईं यह प्रशासन का प्रश्न है; लेकिन उन योजनाओं से बच्चे के जीवन में क्या बदला यह शिक्षा का प्रश्न है।
बच्चा किसी विभाग का लाभार्थी भर नहीं है। वह हमारे समाज का वर्तमान भी है। और भविष्य भी उसका जीवन विभागों में विभाजित नहीं है। इसलिए उसके विकास की व्यवस्था भी विभाजित नहीं हो सकती।
हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी जिसमें शिक्षा का हाथ स्वास्थ्य से जुड़े, स्वास्थ्य का हाथ समग्र कल्याण से, कौशल का हाथ रोजगार और आत्मनिर्भरता से, खेल का हाथ अनुशासन और सहयोग से, संस्कृति का हाथ पहचान से और परामर्श का हाथ आत्म समझ से।
तभी समन्वय एक सरकारी शब्द से आगे बढ़कर बच्चे के जीवन में दिखाई देने वाला अनुभव बनेगा। और अंततः हमारी दिशा इतनी सरल होनी चाहिए कि
एक लक्ष्य।
अनेक संस्थाएँ।
साझी जिम्मेदारी।
और केंद्र में एक बच्चा।